रत्नेश कुशवाहा और पीएम मोदी
बीजेपी ने अपने उम्मीदवारों की सूची में एक ऐसा नाम शामिल किया है जो हाल ही में चर्चित कानूनी लड़ाई से सुर्खियों में आया था. रत्नेश कुशवाहा वही वकील हैं जिन्होंने पीएम मोदी की मां के नाम पर बनाए गए फर्जी AI वीडियो के खिलाफ मोर्चा संभाला था. अब पार्टी ने उन्हें विधानसभा चुनाव में टिकट देकर सम्मानित किया है.
कौन हैं रत्नेश कुशवाहा?
रत्नेश कुशवाहा एक सरकारी वकील हैं जो पटना में प्रैक्टिस करते हैं. वे अपने पेशेवर जीवन में कई महत्वपूर्ण मामलों में शामिल रहे हैं और उनकी कानूनी विशेषज्ञता को सराहा गया है.
पीएम मोदी की मां AI वीडियो मामला
कुछ समय पहले कांग्रेस पार्टी के आधिकारिक ट्विटर हैंडल पर एक AI-जनित वीडियो पोस्ट किया गया था, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मां को दिखाया गया था. इस वीडियो को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ और बीजेपी ने इसे प्रधानमंत्री की मां का अपमान बताया.
पटना हाई कोर्ट में रत्नेश कुशवाहा की याचिका
रत्नेश कुशवाहा ने इस मामले में पटना हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसमें उन्होंने वीडियो को हटाने की मांग की थी. कोर्ट ने उनकी याचिका पर विचार करते हुए वीडियो पर रोक लगा दी थी, जिससे रत्नेश की कानूनी विशेषज्ञता की सराहना हुई. हाई कोर्ट के इस आदेश के बाद रत्नेश कुशवाहा सुर्खियों में आए थे.
दरअसल, पेशे से वकील रत्नेश कुशवाहा कुम्हरार विधानसभा के मुसल्लहपुर के रहने वाले हैं. सुशील मोदी से उनका करीबी का रहा था. अभी पटना हाईकोर्ट में वकील हैं. करीब 40 वर्ष के युवा रत्नेश कुशवाहा शुरू से ही संघ से जुड़े रहे हैं. पटना कॉलेज का छात्र रहते हुए वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) से जुड़े थे. इसके बाद लगातार छोटे कार्यकर्ता के रूप में वो बीजेपी के लिए काम करते रहे.
बताया जाता है कि पार्टी में रत्नेश कुशवाहा का कद पार्टी में बहुत बड़ा नहीं था, लेकिन सुशील मोदी अपने सारे काम इनसे करवाते थे. क्योंकि रत्नेश को कानून की अच्छी जानकारी शुरू से रही है.
बीजेपी द्वारा टिकट की घोषणा
14 अक्टूबर 2025 को बीजेपी ने बिहार विधानसभा चुनाव के लिए अपनी पहली सूची जारी की, जिसमें रत्नेश कुशवाहा को पटना साहिब सीट से उम्मीदवार घोषित किया गया. यह सीट पहले विधानसभा स्पीकर नंदकिशोर यादव के पास थी, जिनका टिकट काटकर रत्नेश को यह जिम्मेदारी दी गई है.
क्या कहा रत्नेश कुशवाहा ने?
रत्नेश कुशवाहा ने बीजेपी द्वारा उन्हें टिकट दिए जाने पर आभार व्यक्त किया और उन्होंने पार्टी के निर्णय को सराहा. उन्होंने कहा कि यह उनके लिए एक नई जिम्मेदारी है और वे जनता की सेवा में पूरी निष्ठा से कार्य करेंगे.
विधानसभा चुनाव के लिहाज से पटना साबिह इलाके के जातीय समीकरण की बात करें तो 70 हजार कुशवाहा जाति का वोट है. वैश्य की संख्या 85 से 90 हजार है. वैश्य में कई उपजातियां हैं, जिसका वोट कुछ इधर-उधर भी होता रहा है. यहां से अधिकांश वोट बीजेपी को मिलता रहा है.
पटना साहिब सीट इलाके में मुस्लिम वोटरों की संख्या 30 से 40 हजार के करीब है. 20 से 25 हजार यादव मतदाता हैं. साल 2015 में पटना के पूर्व उप मेयर रहे संतोष मेहता को आरजेडी से टिकट दिया गया था, जिसके बाद नंद किशोर यादव की जीत मात्र ढाई हजार वोटों के अंतर से हुई थी. कुछ वोट जाति के आधार पर संतोष मेहता को मिल गया था.
साल 2020 में कांग्रेस ने प्रवीण कुशवाहा को टिकट दिया था, लेकिन जीत नंद किशोर यादव की हुई. वोट का मार्जिन कम रहा था. अब ऐसे में बीजेपी कुशवाहा जाति को नजरअंदाज करके नहीं चलना चाहती थी और नंद किशोर यादव को हटाकर यहां से कुशवाहा जाति को उम्मीदवार बनाया गया है.
पीएम मोदी और डोनाल्ड ट्रंप
भारत और अमेरिका के बीच टैरिफ वार पिछले कुछ समय से सुर्खियों में है. अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 'अमेरिका फर्स्ट' पॉलिसी के तहत कई देशों पर भारी शुल्क लगाए थे, जिनमें भारत भी शामिल था, लेकिन भारत ने हर बार सीधे-सीधे उसी अंदाज में पलटवार नहीं किया. मोदी सरकार ने ऐसा क्यों किया. क्या भारत ट्रंप के अंदाज में इसका जवाब नहीं दे सकता. इसका जवाब ये है कि भारत वैश्विक मामलों में कभी भी पलटवार नहीं करता. इसके पीछे कई वजह हैं, जिसे जानना जरूरी है.
1. अमेरिका भारत के सबसे बड़े ट्रेड पार्टनर्स में से एक है. भारत की आईटी सेवाएं, फार्मा, हीरे-गहने और कपड़ा आदि उसी पर निर्भर है. अगर भारत पलटवार करता है तो अमेरिकी बाजार खोने का खतरा है.
2.अमेरिका और भारत सिर्फ व्यापारिक पार्टनर नहीं, बल्कि रणनीतिक सहयोग भी हैं. रक्षा सौदे, इंडो–पैसिफिक में चीन को बैलेंस करना और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर जैसे मुद्दों पर अमेरिका अहम साझेदार है. टैरिफ पर आक्रामक जवाब देने से दोनों देशों के रक्षा और रणनीतिक रिश्ते बिगड़ सकते थे.
3. भारत के कई सेक्टर जैसे-कृषि और छोटे उद्योग पहले से ही चुनौतियों का सामना कर रहे थे. अमेरिका पर टैरिफ लगाने से वहां से आयात महंगा हो जाता, जिससे भारतीय उद्योगों को नुकसान पहुंच सकता था. भारत 'विन-विन' रणनीति अपनाना चाहता था.
4. भारत ने हमेशा "रूल-बेस्ड ट्रेड" यानी WTO (विश्व व्यापार संगठन) के नियमों का समर्थन किया है. ट्रंप का रवैया कई बार 'एकतरफा' माना गया है. जबकि भारत ने खुद को एक जिम्मेदार ट्रेड पार्टनर के तौर पर पेश किया है. ताकि वह दुनिया में 'संतुलित खिलाड़ी' दिख सके.
5. भारत सरकार ने टकराव के बजाय बातचीत पर ज्यादा जोर दिया है. कई बार भारत ने आंशिक जवाबी टैरिफ लगाए, लेकिन पूरी तरह ट्रंप के अंदाज में पलटवार नहीं किया.
6. भारत आईटी, रक्षा, स्टार्टअप और ऊर्जा क्षेत्र में अमेरिकी निवेश और तकनीक पर काफी निर्भर है. टैरिफ वॉर से यह सहयोग प्रभावित हो सकता है. ऐसे में भारत का जवाबी टैरिफ लगाना सही होगा क्योंकि हमारा आईटी निर्यात साल 2024-25 में भारतीय 224.4 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जिसमें अमेरिका प्रमुख बाजार है.
7. भारत-चीन तनाव के बीच अमेरिका, भारत के लिए रणनीतिक सहयोग की भूमिका निभा रहा है. भारत नहीं चाहता कि व्यापारिक विवाद इस साझेदारी को कमजोर करे.
8. विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में भारत के राजदूत रहे जयंत दास गुप्ता का कहना है कि अमेरिका पर जवाबी टैरिफ लगाने से भारत की घरेलू और निर्यात बाजारों को ही नुकसान होगा. ऐसा करने से सर्विस सेक्टर में भी नुकसान हो सकता है, जिसे टालना जरूरी है.
9. वैश्विक मामलों के जानकारों का कहना है कि चीन की तरह अमेरिका पर टैरिफ लगाना भारत के लिए आर्थिक नजरिए से फायदेमंद नहीं होगा. भारत के लिए सही रास्ता है कूटनीति, घरेलू अर्थव्यवस्था को मजबूत करना होगा.
भारत ने ट्रंप के टैरिफ युद्ध का सीधा जवाब न देकर रणनीतिक धैर्य दिखाया है. उसकी प्राथमिकता आर्थिक स्थिरता, रणनीतिक साझेदारी और अंतरराष्ट्रीय छवि है. यही वजह है कि भारत ने ट्रंप की 'आक्रामक टैरिफ पॉलिसी' का पलटवार उसी अंदाज में नहीं किया बल्कि एक संतुलित रास्ता अपनाया.
ऑनलाइन पोर्टल केवल आवेदन स्वीकार करते हैं. वे स्वयं नाम नहीं हटा सकते.
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने चुनाव आयोग पर अपना हमला तेज कर दिया कि और उस पर 'वोट चोर' कहे जाने वाले लोगों को बचाने का आरोप लगाया है. गुरुवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने दावा किया कि 2023 के कर्नाटक विधानसभा चुनावों के दौरान एक केंद्रीकृत, सॉफ्टवेयर-आधारित अभियान के जरिए हजारों कांग्रेस समर्थकों के नाम हटाने का लक्ष्य बनाया गया था. राहुल गांधी के इन आरोपों को चुनाव आयोग ने तत्काल खारिज कर दिया. कहा कांग्रेस सांसद को नियमों की समझ नहीं है. इसके बावजूद यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या कोई मतदाता सूची से आपका नाम काट सकता है.
राहुल गांधी ने आरोप लगाया है कि उन्होंने कहा कि अलांद निर्वाचन क्षेत्र में लगभग 6 हजार नाम एक ऐसे प्रोग्राम द्वारा चुने गए थे जो स्वचालित रूप से 'हर बूथ के पहले मतदाता' का इस्तेमाल करके नाम हटाने के इच्छुक आवेदक का रूप धारण कर लेता था. उन्होंने मंच पर एक मतदाता, जिसका नाम हटाने का प्रयास किया गया था और एक पड़ोसी, जिसके विवरण का दुरुपयोग किया गया था, दोनों को परेड कराई, दोनों ने कोई भी अनुरोध दायर करने से इनकार किया.
मोबाइल फोन और ओटीपी डाटा जारी करे EC
राहुल गांधी ने तर्क दिया कि यही प्रणाली कई राज्यों में इस्तेमाल की जा रही है. महाराष्ट्र के राजुरा निर्वाचन क्षेत्र को लेकर उन्होंने आरोप लगाया कि 6,815 नाम धोखाधड़ी से जोड़े गए थे, जिससे पता चलता है कि सॉफ्टवेयर हटाने और जोड़ने, दोनों में सक्षम था. उन्होंने कहा कि यह तरीका केवल कर्नाटक और महाराष्ट्र तक ही सीमित नहीं है बल्कि हरियाणा और उत्तर प्रदेश तक भी लागू है. उन्होंने मांग की कि चुनाव आयोग एक हफ्ते के भीतर इन एप्लीकेशन में इस्तेमाल किए गए मोबाइल फोन और ओटीपी का डाटा जारी करें.
चुनाव आयोग का जवाब - राहुल ने गलत समझा
चुनाव आयोग ने राहुल गांधी के आरोपों को पूरी तरह से खारिज कर दिया है. उसने कहा कि वोटों को ऑनलाइन नहीं हटाया जा सकता. इस प्रक्रिया को राहुल गांधी ने गलत समझा है. पोर्टल और ऐप्स केवल आवेदन दाखिल करने की अनुमति देते हैं, जिनकी फिर जांच की जाती है. उसने जोर देकर कहा कि नोटिस जारी किए बिना और मतदाता को सुनवाई का अवसर दिए बिना कोई भी नाम नहीं हटाया जा सकता.
अलंद मामले में आयोग ने साफ किया कि 2023 में विसंगतियों को स्वयं चुनाव आयोग ने खुद चिह्नित किया था और प्राथमिकी दर्ज की थी. उसने बताया कि वास्तव में कांग्रेस ने 2023 में अलंद सीट जीती थी, जिसके व्यवस्थित रूप से निशाना बनाए जाने के दावों को कमजोर कर दिया गया.
चुनाव आयोग ने इस बात पर जोर दिया कि मतदाता सूची से नाम हटाना कानून द्वारा नियंत्रित होता है, तकनीक द्वारा नहीं. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 और मतदाता पंजीकरण नियम 1960, मतदाता सूची से नाम हटाने की रूपरेखा निर्धारित करते हैं. यह प्रक्रिया दुरुपयोग को रोकने और यह सुनिश्चित करने के लिए बनाई गई है कि बिना सूचना दिए या चुनौती देने का मौका दिए बिना कोई भी अपना वोट न खो दे.
मतदाता सूची ने नाम हटाने की प्रक्रिया फॉर्म 7 भरने से शुरू होती है. अगर कोई मतदाता का नाम हटाना चाहता है या मतदाता सूची में किसी नाम पर आपत्ति करता है, तो उसे निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (ERO) को फॉर्म 7 जमा करना होता है. उसे निर्वाचन क्षेत्र का नाम, मतदाता को EPIC नंबर, नाम हटाने का कारण और आवेदक का अपना विवरण और हस्ताक्षर जैसी प्रमुख जानकारी देनी होती है. जमा करने के बाद स्थानीय बूथ स्तरीय अधिकारी (BLO) एक पावती जारी करता है.
मनमाने या राजनीतिक आधार पर नाम हटाने की मांग नहीं की जा सकती. इसके बाद ईआरओ अनुरोध की जांच करता है. प्रत्येक आवेदन को आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज किया जाता है. यदि कोई फॉर्म अधूरा या दोषपूर्ण है तो उसे प्रारंभिक चरण में ही अस्वीकार किया जा सकता है. नाम हटाने का काम जमीनी स्तर सत्यापन के बाद होता है. साक्ष्यों पर विचार करने के बाद, ईआरओ या तो आवेदन को अस्वीकार कर देता है या नाम हटाने को मंजूरी देता है. यदि मंजूरी मिल जाती है तो नाम हटा दिया जाता है.
जो मतदाता मानता है कि उसका नाम गलती से हटा दिया गया है, वह ईआरओ के आदेश को चुनौती दे सकता है. वे निवास और पहचान के प्रमाण के साथ फॉर्म 6 भरकर नाम शामिल करने के लिए नए सिरे से आवेदन भी कर सकते हैं. फॉर्म 7 आवेदन में की गई झूठी घोषणाएं जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धारा 31 के तहत दंडनीय हैं.
क्या कोई पड़ोसी आपका वोट हटा सकता है?
कानूनी तौर पर उसी निर्वाचन क्षेत्र का कोई भी मतदाता किसी अन्य मतदाता के नाम पर आपत्ति जताते हुए फॉर्म 7 दाखिल कर सकता है, लेकिन इससे वोट स्वतः नहीं हटता. निर्वाचन अधिकारी (ईआरओ) द्वारा कोई भी आदेश पारित करने से पहले नोटिस जारी करना, सत्यापन करना और सुनवाई करना आवश्यक है. इन चरणों के बिना, नाम हटाना गैरकानूनी है. झूठा आवेदन दाखिल करना एक दंडनीय अपराध है.
क्या कोई सॉफ्टवेयर या ऑटोमेशन वोटों को हटा सकता है?
राहुल गांधी ने आरोप लगाया है कि फर्जी मोबाइल नंबर और ओटीपी का उपयोग करके एक स्वचालित प्रणाली के माध्यम से हजारों आवेदन दाखिल किए गए थे. नियमों के तहत ऑनलाइन पोर्टल केवल आवेदन स्वीकार करते हैं. वे स्वयं नाम नहीं हटा सकते. हर मामले में सत्यापन और सुनवाई की आवश्यकता होती है. संदिग्ध सामूहिक हेरफेर के मामलों में भी, ईआरओ को उचित प्रक्रिया का पालन करना होता है. यदि गलत तरीके से ऐसा किया गया तो यह धोखाधड़ी और आपराधिक षडयंत्र के समान माना जाता है. यह स्वयं कानूनी सुरक्षा उपायों को दरकिनार नहीं करेगा. सॉफ्टवेयर सिस्टम में आवेदनों की बाढ़ ला सकता है. यह स्वयं मतदाता सूची से नाम नहीं मिटा सकता.
रणवीर सेना के प्रमुख रहे ब्रह्मेश्वर मुखिया और उनके पोते चंदन सिंह
रणवीर सेना, जिसने 90 के दशक में कई बड़े नरसंहारों को अंजाम दिया था, अब राजनीतिक मोर्चे पर उतरने की तैयारी में है. ब्रह्मेश्वर मुखिया के पोते चंदन सिंह ने बताया कि नई पार्टी का नाम “लोक जनशक्ति किसान पार्टी” (LJKP) रखा गया है. उनका दावा है कि यह पार्टी भूमिहारों और किसानों के अधिकारों के लिए संघर्ष करेगी. चंदन सिंह का कहना है कि अब समय है कि 'कृषक समाज' राजनीति में अपनी आवाज बुलंद करे.
चंदन सिंह के मुताबिक पार्टी का उद्देश्य बिहार में “कृषि आधारित रोजगार” को बढ़ावा देना और युवाओं के लिए विकास का नया मॉडल तैयार करना है. वे 65 सीटों पर उम्मीदवार उतारने का दावा कर रहे हैं. इस ऐलान के बाद बिहार की सियासत में नए समीकरण बनने की संभावना है.
रणवीर सेना की शुरुआत पर चंदन सिंह कहते हैं, ‘सहार ब्लॉक में एक गांव है एकवारी. 90 के दशक में वहां नक्सलियों का सबसे ज्यादा प्रभाव था. उन्होंने वहां सामंतों के खिलाफ विद्रोह की मुहिम चलाई थी. सामंत कोई था नहीं. 5 से 10 बीघा वाले किसान थे. नक्सली उनकी जमीनों पर झंडे गाड़ने लगे. कहने लगे कि अब आप यहां खेती नहीं करोगे.’
चंदन सिंह ने आगे कहा, 'नक्सलियों के इस रुख का सबसे ज्यादा असर भूमिहार, ब्राह्मण और राजपूतों पर हुआ. उनकी जाति पूछकर गर्दन काट दी जाती थी. गांवों में भयावह स्थिति थी. लोग शहरों की ओर पलायन कर रहे थे. हमारे सामने दो रास्ते थे, या तो भाग जाते या लड़ते. अपने सम्मान और जमीन की रक्षा के लिए किसी न किसी को आगे आना ही था. आत्मा रणवीर सेना से जुड़ी रहेगी, लेकिन यह संगठनात्मक और वैचारिक रूप से रणवीर सेना से अलग है.' उन्होंने कहा, 'रणवीर सेना का गठन भूमिहारों और अन्य सवर्णों की सुरक्षा के लिए नक्सलवाद के खिलाफ किया गया था, और उनकी पार्टी उसी उद्देश्य को आगे बढ़ाएगी.'
शाहाबाद में सक्रिय हैं चंदन
चंदन सिंह की पार्टी भारतीय रणवीर पार्टी शाहाबाद क्षेत्र में सक्रिय है. भारतीय रणवीर पार्टी ने भूमिहार समुदाय के समर्थन से चुनावी मैदान में उतरने की योजना तैयार की है. दैनिक भास्कर ने चंदन सिंह के हवाले से कहा है कि भूमिहार समुदाय का राजनीतिक प्रभाव अब भी महत्वपूर्ण है और उनकी पार्टी उस प्रभाव को फिर से बहाल करना चाहती है. अब यह देखना दिलचस्प होगा कि चंदन सिंह की पार्टी आगामी चुनावों में कितनी सफलता प्राप्त करती है और क्या रणवीर सेना की विरासत को लेकर लोग पार्टी को किस रूप में लेते हैं.
अकेले दम पर लड़ेगी चुनाव, गठबंधन से इनकार
चंदन सिंह की पार्टी रणवीर सेना के समर्थकों और भूमिहार समुदाय के मुद्दों को उठाएगी. कहा है कि हम 65 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की योजना बना रहे हैं. उन्होंने स्पष्ट किया है कि उनकी पार्टी किसी भी मौजूदा गठबंधन(NDA या महागठबंधन) का हिस्सा नहीं होगी. उनकी पार्टी मुख्य रूप से भूमिहार समुदाय के वोटरों को लक्षित करेगी, जो रणवीर सेना के समर्थक रहे हैं.
नरसंहार के इतिहास का पड़ सकता है असर
चंदन सिंह का कहना है कि रणवीर सेना का विवादास्पद इतिहास और उसके द्वारा किए गए नरसंहारों के आरोप पार्टी की छवि पर असर डाल सकते हैं. आने वाले चुनावों में यह देखना दिलचस्प होगा कि चंदन सिंह और उनकी पार्टी चुनाव में कितनी सफलता प्राप्त करती है. बता दें कि ब्रह्मेश्वर मुखिया को एक ओर जहां सवर्ण समुदाय का मसीहा माना जाता है, वहीं दलित और पिछड़े वर्ग के लोग उन्हें नरसंहारों का आरोपी मानते हैं.
रणवीर सेना का इतिहास
रणवीर सेना एक जातीय उग्रवादी संगठन था, जिसकी स्थापना 1994 में बिहार के भोजपुर जिले के बेलाऊर गांव में हुई थी. इसका गठन भूमिहार जमींदारों ने किया था, जो अपनी जमीनी हकों की रक्षा के लिए सक्रिय थे. संगठन का नेतृत्व ब्रह्मेश्वर सिंह उर्फ बरमेश्वर मुखिया ने किया, जिन्हें 'रणवीर सेना का मुखिया' के रूप में जाना जाता था.
कौन थे ब्रह्मेश्वर मुखिया?
ब्रह्मेश्वर मुखिया को बरमेश्वर मुखिया के नाम से भी जाना जाता था. वह बिहार में एक उच्च जाति के जमींदार उग्रवादी समूह रणवीर सेना के रूप में कार्यरत एक नक्सल-विरोधी संगठन रणवीर सेना के संस्थापक थे. 1 जून 2012 को अज्ञात बंदूकधारियों ने उनकी हत्या कर दी थी.
ब्रह्मेश्वर मुखिया का जन्म एक भूमिहार परिवार में हुआ था और बाद में 1994 में रणवीर सेना के गठन के तुरंत बाद वह इसके नेता बन गए. मुखियाजी पर सैकड़ों नक्सलियों की हत्याओं में शामिल होने का संदेह था, जिन्होंने गरीब और दलित पृष्ठभूमि के लोगों की भर्ती की थी. 2002 में सिंह को 'नरसंहार' के आरोप में गिरफ्तार किया गया था, जिसके लिए उन्हें आजीवन कारावास की संभावना का सामना करना पड़ा. उन्होंने मुकदमे की प्रतीक्षा में नौ साल जेल में बिताए और फिर जमानत पर रिहा हुए और बाद में अपर्याप्त सबूतों के कारण बरी कर दिए गए.
जेल से रिहा होने के बाद 5 मई 2012 को सिंह ने अखिल भारतीय राष्ट्रवादी किसान संगठन की स्थापना की. एक ऐसा संगठन जिसके बारे में सिंह ने कहा कि यह किसानों और अन्य मजदूरों की सहायता करेगा. 1 जून 2012 को, ब्रह्मेश्वर सिंह बिहार के आरा में अपने घर के पास सुबह की सैर पर थे. कथित तौर पर लगभग छह हथियारबंद लोगों ने सिंह को कई गोलियां मारी. मुखिया जी की हत्या के विरोध में कई स्थानों पर दंगे भड़क उठे. कई हजार लोगों ने सर्किट हाउस, खंड विकास अधिकारी कार्यालय और कई सरकारी वाहनों को जला दिया. रेलवे कार्यालयों को क्षतिग्रस्त कर दिया. हावड़ा-दिल्ली मार्ग पर ट्रेनें रोक दीं. मुखिया जी की हत्या से बिहार में बड़े पैमाने पर अराजकता फैल गई.
रणवीर सेना किन-किन नरसंहार को दिया अंजाम
रणवीर सेना का पहला बड़ा नरसंहार सरथुआं गांव में हुआ, जहां 5 मुसहर जाति के लोगों की हत्या की गई. यह बिहार का सबसे बड़ा नरसंहार माना जाता है, जिसमें 58 दलितों की हत्या की गई. रणवीर सेना ने इसे प्रतिशोध के रूप में अंजाम दिया था. इसमें 22 दलितों की हत्या की गई, जिसे रणवीर सेना ने प्रतिशोध के रूप में अंजाम दिया. इसमें 12 दलितों की हत्या की गई, जिसे रणवीर सेना ने प्रतिशोध के रूप में अंजाम दिया. इसमें अगड़ी जाति के 34 लोगों की हत्या की गई. रणवीर सेना ने इसे प्रतिशोध के रूप में अंजाम दिया. इसके अलावा, हैबसपुर में 10 और मियांपुर में 26 हत्याओं को अंजाम दिया था.