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Vice President Election India 2025: देश में उपराष्ट्रपति पद के लिए होने वाले चुनाव को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है. विपक्षी गठबंधन INDIA ब्लॉक ने बुधवार को अपने उम्मीदवार बी. सुदर्शन रेड्डी का नामांकन दाखिल करा दिया. नामांकन के मौके पर कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी, पार्टी अध्यक्ष और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) प्रमुख शरद पवार, समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता रामगोपाल यादव और शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) के नेता संजय राउत समेत विपक्ष के कई दिग्गज नेता मौजूद रहे. इस दौरान विपक्ष ने अपनी एकजुटता का प्रदर्शन किया.
एनडीए और विपक्ष आमने-सामने
इससे एक दिन पहले ही एनडीए उम्मीदवार सी.पी. राधाकृष्णन ने नामांकन दाखिल किया था. अब मैदान पूरी तरह साफ है और मुकाबला एनडीए बनाम INDIA गठबंधन के बीच होगा. सूत्रों के मुताबिक, सुदर्शन रेड्डी ने चार सेट में नामांकन दाखिल किया, जिनमें 20 प्रस्तावक और 20 समर्थक शामिल थे. नामांकन से पहले उन्होंने स्वतंत्रता सेनानियों और महान नेताओं को श्रद्धांजलि अर्पित की.
हालांकि नंबर गेम में विपक्षी गठबंधन पीछे है, क्योंकि संसद में एनडीए के पास मजबूत बहुमत है. इसके बावजूद INDIA ब्लॉक ने मुकाबले को दिलचस्प बनाने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी है. विपक्ष के इस कदम को राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें यह दिखाने की कोशिश की जा रही है कि वे पूरी मजबूती और एकता के साथ लोकतांत्रिक लड़ाई लड़ने को तैयार हैं.
“दक्षिण बनाम दक्षिण” की तस्वीर
इस चुनाव की एक खासियत यह है कि दोनों ही गठबंधनों ने अपने-अपने उम्मीदवार दक्षिण भारत से चुने हैं. एनडीए ने जहां तमिलनाडु से आने वाले सी.पी. राधाकृष्णन को उम्मीदवार बनाया है, वहीं INDIA गठबंधन ने आंध्र प्रदेश के सुदर्शन रेड्डी को मैदान में उतारा है. ऐसे में यह चुनाव “दक्षिण बनाम दक्षिण” की दिलचस्प तस्वीर पेश कर रहा है. राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि विपक्ष का यह फैसला एक रणनीतिक कदम है, क्योंकि दक्षिण भारत में बीजेपी का प्रदर्शन अपेक्षाकृत कमजोर रहा है और विपक्ष यहां अपनी पकड़ मजबूत करने का संदेश देना चाहता है.
विपक्ष का शक्ति प्रदर्शन
नामांकन के दिन सुबह 11 बजे कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे के कक्ष में INDIA गठबंधन के सभी प्रमुख नेता एकत्र हुए. इसके बाद वे सामूहिक रूप से राज्यसभा महासचिव और उपराष्ट्रपति चुनाव के रिटर्निंग ऑफिसर पी.सी. मोदी के दफ्तर पहुंचे और सुदर्शन रेड्डी का नामांकन दाखिल कराया. इस मौके पर कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने पूरे कार्यक्रम की जानकारी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर साझा की.
जयराम रमेश ने लिखा कि विपक्ष के लिए यह केवल एक चुनावी प्रक्रिया नहीं बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करने का संकल्प है. उन्होंने कहा कि INDIA ब्लॉक भले ही संख्या के हिसाब से कमजोर दिखाई देता हो, लेकिन उसकी राजनीतिक लड़ाई विचारों और सिद्धांतों पर आधारित है.
विपक्ष के लिए चुनाव का महत्व
विशेषज्ञ मानते हैं कि भले ही उपराष्ट्रपति चुनाव में NDA की जीत लगभग तय मानी जा रही हो, लेकिन विपक्ष का उम्मीदवार उतारना राजनीतिक दृष्टि से अहम है. इससे विपक्ष अपनी मौजूदगी और मुद्दों को सामने रख सकता है. साथ ही यह संदेश भी देने की कोशिश है कि विपक्ष केवल प्रतीकात्मक लड़ाई नहीं लड़ रहा, बल्कि वह संसद से लेकर सड़क तक जनता की आवाज उठाने के लिए तैयार है.
पूर्व उपराष्ट्रपति का फोटो
Jagdeep Dhankhar Resignation: संसद के मानसून सत्र की शुरुआत के साथ ही उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने सोमवार को अचानक अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को एक भावुक पत्र लिखकर स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए अपने इस्तीफे की घोषणा की। हालांकि, उनके इस फैसले ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। विपक्ष का कहना है कि सरकार के दबाव में उन्हें इस्तीफा देना पड़ा।
सूत्रों की मानें तो धनखड़ ने इस्तीफे के दिन से ही अपना सामान पैक करना शुरू कर दिया था, जबकि उनका इस्तीफा अगले दिन यानी मंगलवार को स्वीकार कर लिया गया। उसी दिन शरद पवार और संजय राउत जैसे विपक्षी नेताओं ने मुलाकात का समय मांगा था, लेकिन उन्हें समय नहीं मिला। इस्तीफे के बाद धनखड़ ने किसी भी राजनीतिक नेता से मुलाकात नहीं की है।
क्या है पूरा मामला
गौरतलब है कि सोमवार को उनका पूरा कार्यक्रम सामान्य रहा। उन्होंने सुबह राज्यसभा के मनोनीत सांसदों को शपथ दिलाई, दो बार बीएसी (कार्य मंत्रणा समिति) की बैठक की अध्यक्षता की और कांग्रेस नेता जयराम रमेश से भी मुलाकात की। रमेश ने संकेत दिया कि दोपहर और शाम के बीच कुछ ऐसा हुआ जिसके कारण उन्हें इस्तीफा देना पड़ा।
संविधान के किस आर्टिकल के तहत उपराष्ट्रपति ने दिया इस्तीफा
संविधान के अनुच्छेद 67(ए) के तहत उन्होंने उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे दिया है। हालांकि, अब तक आधिकारिक तौर पर स्वास्थ्य कारणों को ही कारण बताया गया है। धनखड़ को इस्तीफे के बाद भी कई सरकारी सुविधाएं मिलेंगी। उन्हें पेंशन, स्टाफ (2 सहायक, 2 चपरासी), मुफ़्त दवाइयां, मेडिकल जांच और ऑपरेशन की सुविधा मिलेगी। नियमित रूप से एक डॉक्टर की तैनाती भी रहेगी। इसके साथ ही, उन्हें कार्यालय खर्च के लिए ₹60,000, मुफ़्त बिजली-पानी और रेल-हवाई यात्रा की सुविधा भी दी जाएगी।
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Bihar Domicile Rule 2025: बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने हाल ही में एक अहम घोषणा की है, जो सीधे तौर पर राज्य के युवाओं और नौकरी के इच्छुक अभ्यर्थियों से जुड़ी है. उन्होंने शिक्षकों की भर्ती में डोमिसाइल नीति लागू करने का ऐलान किया है. यानी अब शिक्षक भर्ती में बिहार के निवासियों को प्राथमिकता दी जाएगी. यह नियम TRE-4 (Teacher Recruitment Exam-4) से लागू होगा.
मुख्यमंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर यह जानकारी साझा करते हुए कहा कि सरकार 2005 से ही शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए काम कर रही है. अब भर्ती प्रक्रिया में बिहार के निवासियों को वरीयता देने के लिए शिक्षा विभाग को नियमों में संशोधन करने का निर्देश दे दिया गया है.
डोमिसाइल नीति क्या है?
डोमिसाइल नीति का मतलब है कि किसी राज्य में सरकारी नौकरी के लिए वही व्यक्ति आवेदन कर सकेगा जो उस राज्य का निवासी हो. यानी, बिहार में शिक्षक बनने के लिए अब बिहार का निवासी होना जरूरी होगा. इस नीति के अंतर्गत माता-पिता के बिहार निवासी होने, या पति/पत्नी के बिहार निवासी होने की स्थिति में भी लाभ मिल सकता है. यह नीति पहले भी 2020 में लागू की गई थी, लेकिन 2023 में इसे खत्म कर दिया गया था. उस समय सरकार का कहना था कि गणित और विज्ञान जैसे विषयों के लिए योग्य शिक्षक बिहार में नहीं मिल पा रहे थे. उस वक्त तेजस्वी यादव भी सरकार का हिस्सा थे.
चुनावी मौसम और घोषणाओं की बाढ़
अब जब बिहार में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं, तो एक बार फिर सरकार ने डोमिसाइल नीति को बहाल कर दिया है. इस पर विपक्ष ने तुरंत प्रतिक्रिया दी है. तेजस्वी यादव ने कहा कि यह उनकी पुरानी मांग रही है, जिसे NDA सरकार ने पहले खारिज कर दिया था. अब जब चुनाव पास हैं, तो वही मांगों को नकल करके लागू किया जा रहा है.
तेजस्वी ने आरोप लगाया कि नीतीश सरकार ने हर वर्ग को साधने के लिए एक के बाद एक घोषणाएं की हैं, ताकि चुनाव से पहले सभी वोट बैंक खुश किए जा सकें. उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, “सामाजिक सुरक्षा पेंशन, बिजली की फ्री यूनिट, सरकारी नौकरी, रसोइयों-रात्रि प्रहरियों और स्वास्थ्य अनुदेशकों के मानदेय में बढ़ोतरी, युवा आयोग का गठन-ये सब हमारी योजनाओं की नकल हैं.”
नीतीश कुमार की रणनीति
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो नीतीश कुमार अब चाणक्य वाली राजनीति नहीं, बल्कि 'सुशासन बाबू' वाली छवि को सामने रखकर चुनाव लड़ना चाहते हैं. पाला बदलने का विकल्प अब सीमित है, इसलिए सीधे जनता को साधना ही उनका प्रमुख रास्ता बचा है. जुलाई 2025 में नीतीश कुमार ने वादा किया था कि सरकार आने वाले 5 सालों में एक करोड़ युवाओं को नौकरी या रोजगार देगी. उन्होंने यह भी कहा कि अब तक 10 लाख लोगों को सरकारी नौकरी और 39 लाख को रोजगार मिल चुका है.
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Shibu Soren Death: झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के संस्थापक शिबू सोरेन का सोमवार को लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया. वे 81 वर्ष के थे और दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली. अस्पताल के अनुसार, उन्हें 19 जून को भर्ती कराया गया था और 4 अगस्त की सुबह 8:56 बजे उनका निधन हो गया. वे पिछले एक महीने से लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर थे और किडनी संबंधी समस्याओं से जूझ रहे थे. उन्हें कुछ समय पहले ब्रेन स्ट्रोक भी आया था.
अंतिम समय तक साथ रहा परिवार
गंगाराम अस्पताल की ओर से जारी बयान में बताया गया कि शिबू सोरेन की देखरेख नेफ्रोलॉजी विभाग के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. ए.के. भल्ला और न्यूरोलॉजी की टीम कर रही थी. परिवार के सदस्यों के अनुसार, अंतिम समय में उनका पूरा परिवार उनके साथ था.
हेमंत सोरेन का भावुक संदेश
शिबू सोरेन के निधन की पुष्टि उनके बेटे और झारखंड के वर्तमान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने की. उन्होंने भावुक होकर कहा,
"आदरणीय दिशोम गुरुजी हम सभी को छोड़कर चले गए हैं. आज मैं शून्य हो गया हूं." झारखंड की राजनीति में शिबू सोरेन को दिशोम गुरु या गुरुजी के नाम से जाना जाता था.
केंद्रीय नेताओं की श्रद्धांजलि
देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी शोक व्यक्त किया और कहा, "शिबू सोरेन जी झारखंड के उन कद्दावर नेताओं में थे, जिन्होंने जनजातीय समाज के अधिकारों के लिए जीवनभर संघर्ष किया. वे हमेशा जमीन और जनता से जुड़े रहे. उनके निधन से मुझे गहरा दुख हुआ है."
एक संघर्षशील जीवन
शिबू सोरेन का जन्म 11 जनवरी 1944 को हजारीबाग जिले में हुआ था (अब यह क्षेत्र झारखंड में आता है). उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत आदिवासियों के शोषण के खिलाफ संघर्ष से की. 1970 के दशक में ‘धनकटनी आंदोलन’ के जरिए उन्होंने आदिवासी समाज की आवाज बुलंद की.
झारखंड राज्य निर्माण में बड़ी भूमिका
शिबू सोरेन ने बिहार से अलग झारखंड राज्य के निर्माण के लिए निर्णायक भूमिका निभाई. उन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की स्थापना की और पिछले 38 वर्षों से पार्टी के प्रमुख नेता और संरक्षक रहे. उन्हें झारखंड की राजनीति का स्तंभ माना जाता है.
राजनीतिक करियर
उन्होंने पहली बार 1977 में लोकसभा चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए. 1980 में उन्होंने जीत दर्ज की और इसके बाद 1986, 1989, 1991, 1996 में भी लोकसभा चुनाव जीते. 2004 में दुमका से सांसद बने और यूपीए सरकार में कोयला मंत्री बनाए गए, हालांकि बाद में इस्तीफा देना पड़ा. वह तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने (2005, 2008, 2009), लेकिन कभी भी कार्यकाल पूरा नहीं कर सके.
राजनीतिक जीवन की प्रेरणा
शिबू सोरेन के राजनीति में आने की एक बड़ी वजह उनके पिता शोभराम सोरेन की हत्या थी. इसके बाद उन्होंने समाज के कमजोर तबकों की आवाज उठाने की ठानी और अपना पूरा जीवन जनसेवा को समर्पित कर दिया.