CJI सूर्यकांत
सुप्रीम कोर्ट और कार्यपालिका के बीच संतुलन को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है. देश के कई पूर्व जजों, सीनियर वकीलों और शीर्ष शिक्षाविदों ने चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत को खुली चिट्ठी लिखते हुए न्यायपालिका पर गंभीर आरोप लगाए हैं. यह समूह मानता है कि सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले और टिप्पणियां “जुडिशियल ओवररीच” के संकेत देती हैं और अदालतें नीति-निर्माण के क्षेत्र में प्रवेश कर रही हैं. इससे लोकतांत्रिक ढांचे और संविधान द्वारा तय शक्तियों के विभाजन पर असर पड़ रहा है.
क्या है खुली चिट्ठी का मुद्दा?
लगभग 600 से अधिक पूर्व जजों, वकीलों, शिक्षाविदों, नौकरशाह और रिटायर्ड अधिकारियों ने मिलकर यह ओपन लेटर जारी किया है. इस पत्र में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट कई मामलों में नीति-निर्माण जैसी भूमिका निभा रहा है. कोर्ट के फैसले कभी-कभी चुनी हुई सरकार के अधिकार क्षेत्र में दखल देते हैं. अदालतों को संवैधानिक ‘सीमा’ का ध्यान रखना चाहिए.
चिट्ठी में क्या-क्या आरोप?
समूह का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट कई संवेदनशील मामलों में ऐसा दखल दे रहा है जो नीति-निर्माण या प्रशासनिक क्षेत्र से संबंधित हैं,.
पूर्व जजों का कहना है कि संसद सर्वोच्च विधायी संस्था है.अदालतों द्वारा बिल/कानून की मंशा पर टिप्पणी बहस की गुणवत्ता पर सवाल है. अयोग्य या अपर्याप्त प्रक्रिया कहने जैसी बातें लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करती हैं.
चिट्ठी में कहा गया है कि अगर न्यायपालिका और कार्यपालिका के क्षेत्र तय न हों तो “संविधान का चेक-एंड-बैलेंस सिस्टम” प्रभावित होता है. यह भी लिखा गया कि अदालतें चुनी हुई सरकार की जगह नहीं ले सकतीं.
बता दें कि हाल के वर्षों में न्यायपालिका और विधायिका के बीच कई मुद्दों पर मतभेद सामने आए हैं. कॉलेजियम बनाम केंद्र, गवर्नर-राज्य सरकारों का विवाद, नियुक्तियों और ट्रांसफर पर खींचतान व अन्य मसले शामिल हैं. ताजा चिटी इसी तनावपूर्ण माहौल के बीच सामने आई है.
कांग्रेस विधायक सतीश सैल (फाइल फोटो)
ED action on Karnataka Congress MLA: कांग्रेस को एक और बड़ा झटका लगा है. कर्नाटक के कारवार से विधायक सतीश के. सैल को मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने गिरफ्तार कर लिया. अवैध लौह अयस्क निर्यात और करोड़ों की बेनामी संपत्ति के आरोपों ने उनकी राजनीतिक साख को गहरा धक्का दिया है. यह गिरफ्तारी उस समय हुई जब सैल खुद ईडी के सामने पूछताछ के लिए पेश हुए थे, लेकिन जांच एजेंसी ने उन्हें पकड़ लिया. लगातार हो रही केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई ने कांग्रेस नेतृत्व की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं.
मंगलवार को बेंगलुरु में ईडी कार्यालय में पूछताछ के दौरान कांग्रेस विधायक सतीश सैल को गिरफ्तार किया गया. ईडी ने पहले 13 और 14 अगस्त को उनके आवास पर छापेमारी कर भारी मात्रा में नकदी, सोना और अन्य अवैध संपत्ति जब्त की थी. इसके बाद कारवार, गोवा, मुंबई और दिल्ली में उनके ठिकानों पर तलाशी अभियान चलाया गया, जिसमें कई महत्वपूर्ण दस्तावेज, नकदी और सोने की ईंटें दो बक्सों में भरकर जब्त की गईं.
कांग्रेस MLA को पहले ही मिली है 7 साल की सजा
सतीश सैल पर अवैध लौह अयस्क निर्यात से जुड़े मामलों में पहले से ही कार्रवाई चल रही थी. 26 अक्टूबर 2024 को विशेष एमपी-एमएलए कोर्ट ने बेलेकेरी अवैध लौह अयस्क निर्यात मामले में उन्हें सात साल की जेल की सजा सुनाई थी. अदालत ने उन पर 44 करोड़ रुपए का जुर्माना भी लगाया. यह मामला 2010 में दर्ज किया गया था और बाद में सीबीआई ने जांच कर आरोप पत्र दाखिल किया. सतीश सैल इस मामले में दूसरे आरोपी के रूप में नामित थे.
हाल के दिनों में यह तीसरी बार है जब किसी कांग्रेस विधायक को केंद्रीय एजेंसियों ने गिरफ्तार किया है. इससे पहले चित्रदुर्ग से के.सी. वीरेंद्र और धारवाड़ ग्रामीण से विनय कुलकर्णी पर भी कार्रवाई हुई थी. कांग्रेस पर भ्रष्टाचार के आरोप लगातार गहराते जा रहे हैं, जिससे पार्टी की छवि पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है.
ED ने क्या कहा?
ईडी ने सतीश सैल को मेडिकल जांच के लिए भेजा है और जल्द ही उन्हें कोर्ट में पेश किया जाएगा. फिलहाल उनकी गिरफ्तारी से जुड़ी कई बातें अभी स्पष्ट नहीं हैं. ईडी का कहना है कि जांच पारदर्शिता के साथ चल रही है और जो भी तथ्य सामने आएंगे, उन्हें सार्वजनिक किया जाएगा. यह घटना कर्नाटक की राजनीति में बड़ा भूचाल मचा सकती है और कांग्रेस पार्टी की साख पर सवाल खड़े कर सकती है.
जावेद अख्तर
बॉलीवुड के जाने माने गीतकार और स्क्रिप्ट राइटर जावेद अख्तर ने राजा रघुवंशी और सौरभ राजपूत की क्रूर हत्या के मामलों को लेकर लोगों में व्याप्त आक्रोश पर सोमवार को अपनी राय रखी. हाल ही में एक साक्षात्कार में जावेद अख्तर ने स्वीकार किया कि इन मामलों पर राष्ट्रीय प्रतिक्रिया के बारे में उनकी मिली-जुली विचारधारा बयां की. ‘जब महिलाओं को जिंदा जला दिया जाता है तो कोई आक्रोश क्यों नहीं?’
जावेद अख्तर ने ने पूछा, ‘इन दो महिलाओं ने अपने पतियों को मरवा दिया और समाज हिल गया. फिर ऐसी महिलाएं हैं जिन्हें हर दूसरे दिन जिंदा जला दिया जाता हैं. उन्हें हर दिन पीटा जाता है. फिर समाज आक्रोशित नहीं होता.’ उन्होंने तर्क दिया कि महिलाओं द्वारा हिंसा से सदमा और निंदा होती है, लेकिन देश भर में अनगिनत महिलाओं द्वारा लगातार झेले जा रहे दुर्व्यवहार पर अक्सर चुप्पी साध ली जाती है. ‘पुरुषों के अपराधों की बात करें तो समाज बेशर्म है’
स्क्रिप्ट राइटर अख्तर ने इस पाखंड की आलोचना करते हुए कहा कि समाज बेशर्म है. उनके अनुसार, जब पुरुषों ने पीढ़ियों से महिलाओं के खिलाफ क्रूरता की है, तो आक्रोश सीमित या पूरी तरह से गायब रहा है.
जावेद अख्तर ने सामाजिक दबाव का जिक्र करते हुए कहा कि दो औरतों ने हत्या की तो चौकिए पर, जो मर्द उससे शादी कर रहे हैं, उससे उसकी जू नहीं रेंगती. उन्होंने जांचकर्ताओं से यह भी आग्रह किया कि वे इस बात की जांच करें कि क्या इसमें शामिल महिलाओं को शादी के लिए मजबूर किया गया था.
उन्होंने सवाल किया कि क्या छोटे शहरों की युवतियों को विवाह व्यवस्था को नकारने की स्वायत्तता भी है, जो गहरे सामाजिक दबाव की ओर इशारा करता है.
प्रतीकात्मक तस्वीर
Diwali Cursed Village in Himachal Pradesh: हिमाचल प्रदेश में जहां एक ओर देशभर की तरह दीपावली की रौनक दिखाई दे रही है, वहीं हमीरपुर जिले का एक गांव ऐसा भी है, जहां यह पर्व सदियों से नहीं मनाया जाता. जिला मुख्यालय से लगभग 25 किलोमीटर दूर स्थित सम्मू गांव आज भी 'शापित गांव' के नाम से जाना जाता है. यहां के लोग दीपावली के दिन न तो घर सजाते हैं, न पकवान बनाते हैं और न ही किसी तरह का उत्सव मनाते हैं.
ग्रामीणों का मानना है कि अगर कोई दीपावली मनाने की कोशिश करता है, तो गांव में कोई अनहोनी या मृत्यु हो जाती है. गांव के बुजुर्गों के मुताबिक, यह श्राप सैकड़ों साल पुराना है. कहा जाता है कि प्रथम विश्व युद्ध के दौरान दीपावली के दिन गांव की एक महिला अपने मायके जाने के लिए निकली थी. उसी समय उसके पति, जो सेना में तैनात थे, युद्ध के मोर्चे पर शहीद हो गए. जब ग्रामीण उनका शव लेकर गांव लौटे, तो गर्भवती पत्नी यह दृश्य देखकर सहन नहीं कर पाई और अपने पति के साथ सती हो गई.
जाते-जाते उसने पूरे गांव को श्राप दे दिया कि इस गांव में कभी दीपावली नहीं मनाई जाएगी. तब से लेकर आज तक गांव के लोगों ने इस त्योहार का उत्सव नहीं मनाया है. सम्मू गांव के निवासी रघुवीर सिंह रंगड़ा बताते हैं कि हमारे बुजुर्गों के जमाने से ही दीपावली नहीं मनाई जाती. वे कहते हैं,"जब भी किसी ने दीपावली मनाने की कोशिश की, उसके बाद गांव में किसी न किसी की मौत हो गई या कोई बड़ी अनहोनी घट गई." उन्होंने यह भी बताया कि कई बार गांव के लोगों ने इस श्राप से मुक्ति पाने की कोशिश की, पूजा-पाठ और अनुष्ठान भी करवाए, लेकिन कोई असर नहीं हुआ.
गांव की महिला विद्या देवी कहती हैं, "जब दीपावली आती है, मन भारी हो जाता है. चारों ओर रोशनी और खुशियों का माहौल होता है, लेकिन हमारे गांव में उस दिन सन्नाटा छा जाता है. बच्चे तक चुप रहते हैं. हमारे घरों में न दीये जलते हैं, न मिठाइयां बनती हैं."
भोरंज पंचायत की प्रधान पूजा देवी ने भी इस पर मुहर लगाई. उन्होंने कहा, "यह सच है कि सम्मू गांव में आज तक दीपावली नहीं मनाई गई. लोग उस सती के श्राप के डर में जीते हैं. न पकवान बनते हैं, न पटाखे फोड़ते हैं. हर साल यही सवाल उठता है कि आखिर कब यह गांव उस श्राप से मुक्त होगा."