प्रतीकात्मक AI तस्वीर
Nomination Cancelled in Bihar Assembly Election 2025: बिहार के पूर्वी चंपारण जिले में विधानसभा चुनावी प्रक्रिया के तहत 42 उम्मीदवारों के नामांकन पत्र निरस्त कर दिए गए हैं. निरस्त हुए उम्मीदवारों में इण्डिया महागठबंधन की एक और सहयोगी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी (BSP) के तीन उम्मीदवार भी शामिल हैं.
दिलचस्प बात यह है कि दो विधानसभा सीटों पर स्वीकृत नामांकन की तुलना में ज्यादा नामांकन पत्र निरस्त किए गए हैं. जिले की कुल 12 विधानसभा सीटों पर दूसरे चरण के चुनाव होने हैं. सोमवार तक सभी सीटों के लिए कुल 142 उम्मीदवारों ने नामांकन पत्र दाखिल किए थे, जिनकी जांच मंगलवार (21 अक्टूबर) को की गई.
जांच के दौरान 42 नामांकन पत्र विभिन्न तकनीकी खामियों के कारण निरस्त कर दिए गए. निरस्त उम्मीदवारों में सिगौली विधानसभा क्षेत्र के वर्तमान RJD विधायक शशि भूषण सिंह का नाम भी शामिल है. इस बार उन्होंने इण्डिया महागठबंधन की सहयोगी पार्टी विकासशील इंसान पार्टी (VIP) के टिकट पर नामांकन दाखिल किया था, लेकिन उनके नामांकन पत्र में दस प्रस्तावकों के बजाय केवल एक के हस्ताक्षर पाए गए, जिसे तय समय में सुधार नहीं किया जा सका. इस वजह से महागठबंधन को अपनी एक सीट खोनी पड़ी.
इसी तरह BSP के उम्मीदवारों में रक्सौल से गोतम कुमार, हर्सदही (सुरक्षित) से संतोष कुमार राम और चरिया विधानसभा क्षेत्र से बंदिशोरी राम के नामांकन पत्र भी तकनीकी खामियों के कारण निरस्त हुए हैं. पूर्वी चंपारण के 12 विधानसभा सीटों पर दाखिल कुल 142 नामांकन पत्रों में से निरस्त नामांकन पत्रों का वितरण इस प्रकार है: रक्सौल में 2, सिगौली में 5, नरकटिया में 8, हर्सदही में 4, केसरी में 3, पिपरा में 2, मधुबन में 3, मोतिहारी में 3, चरिया में 10 और ढाका में 2 नामांकन पत्र निरस्त किए गए.
इनमें नरकटिया और चरिया ऐसे विधानसभा क्षेत्र हैं, जहां निरस्त नामांकन पत्र स्वीकृत नामांकन पत्रों से अधिक हैं. नरकटिया में कुल 15 नामांकन पत्र दाखिल हुए, जिनमें 7 स्वीकार किए गए और 8 निरस्त हो गए. इसी तरह चरिया में कुल 17 नामांकन में से 7 स्वीकृत और 10 निरस्त हुए. सिगौली में मामला बराबरी का रहा, 10 में से 5 स्वीकार और 5 निरस्त हुए.
दूसरे चरण में पूर्वी चंपारण के कुल 34,38,078 मतदाता 11 नवंबर को अपने मत का प्रयोग करेंगे. नामांकन पत्रों की जांच के बाद 23 अक्टूबर तक नाम वापस लिए जा सकते हैं. यदि कोई उम्मीदवार नाम वापस नहीं लेता है तो 12 विधानसभा सीटों के लिए कुल 100 उम्मीदवार मैदान में रहेंगे, जिनकी किस्मत का फैसला मतदाता करेंगे.
फाइल फोटो
Monsoon Parliament Session 2025: केंद्र सरकार आज बुधवार (20 अगस्त) को लोकसभा में तीन बड़े विधेयक पेश करने जा रही है, जो प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्रियों को हटाने से जुड़े हैं. दरअसल, सरकार का मकसद ऐसे हालात में कानूनी ढांचा तैयार करना है, जब पीएम, सीएम या मंत्री पर गंभीर आपराधिक आरोप लगने के बाद उन्हें गिरफ्तार या हिरासत में लिया जाए.
इस कड़ी में सरकार केंद्र शासित प्रदेश सरकार (संशोधन) विधेयक 2025, संविधान (130वां संशोधन) विधेयक 2025 और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक 2025 संसद में लाने वाली है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह इन तीनों विधेयकों को संसद की एक संयुक्त समिति को भेजने का प्रस्ताव भी लोकसभा में रखेंगे. हालांकि विपक्ष इसके कड़े विरोध की तैयारी में है.
केंद्र शासित प्रदेश सरकार (संशोधन) विधेयक
इस बिल का मकसद केंद्र शासित प्रदेशों में सीएम और मंत्रियों को लेकर कानूनी खामियों को दूर करना है. वर्तमान में केंद्र शासित प्रदेश सरकार अधिनियम, 1963 के तहत ऐसे प्रावधान नहीं हैं कि यदि किसी मुख्यमंत्री या मंत्री को गंभीर आपराधिक मामले में गिरफ्तार कर लिया जाए तो उन्हें पद से हटाया जा सके. इसलिए सरकार ने इस कानून की धारा 45 में संशोधन कर यह व्यवस्था लागू करने की पहल की है.
संविधान संशोधन और जम्मू-कश्मीर विधेयक
हिंदुस्तान में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, संविधान (130वां संशोधन) विधेयक 2025 में प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री, राज्यों और दिल्ली के मुख्यमंत्री या मंत्री को गंभीर आपराधिक आरोपों में हिरासत या गिरफ्तारी की स्थिति में पद से हटाने का प्रावधान किया गया है. इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 75, 164 और 239एए में संशोधन का प्रस्ताव है.
वहीं, जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक 2025 का मकसद 2019 के जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम में संशोधन करना है. अभी तक इस कानून में भी ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि गिरफ्तारी या हिरासत में जाने पर सीएम या मंत्री को पद से हटाया जा सके. नए संशोधन के तहत धारा 54 में बदलाव करके इस व्यवस्था को लागू किया जाएगा. कुल मिलाकर, आज लोकसभा में पेश होने वाले ये तीनों विधेयक सत्ता से लेकर विपक्ष तक सियासी बहस को तेज करने वाले हैं.
ये भी पढ़ें: बी. सुदर्शन रेड्डी कौन हैं? सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज पर INDIA गठबंधन ने बनाया उपराष्ट्रपति का उम्मीदवार
राहुल गांधी
बिहार की राजनीति में महागठबंधन में शामिल दलों के लिए एक बार फिर से बदलाव के दौर से गुजर रहा है. राहुल गांधी की एसआईआर के खिलाफ 'वोटर अधिकार यात्रा' से कांग्रेस को संजीवनी मिली है. दूसरी तरफ राष्ट्रीय जनता दल के प्रमुख लालू यादव और तेजस्वी यादव को अपने परंपरागत वोट बैंक पर इसके असर की चिंता सताने लगी है. यह यात्रा महज कांग्रेस के लिए संगठन विस्तार का जरिया नहीं बल्कि महागठबंधन के भीतर ताकत दिखाने का भी संकेत है.
दरअसल, कांग्रेस लंबे समय से बिहार की राजनीति में हाशिये पर थी, लेकिन राहुल गांधी की वोटर अधिकार यात्रा के जरिए पार्टी ने गांव-गांव और पंचायत स्तर पर पैठ बनाने की कोशिश की है, इस अभियान से कांग्रेस को युवाओं, दलित-ओबीसी और मुसलमानों मतदाताओं से जोड़ने का भी काम किया है.
अब क्या करेंगे तेजस्वी यादव?
बिहार में महागठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी RJD के लिए कांग्रेस की यह बढ़ती सक्रियता टेंशन की वजह है. ऐसा इसलिए कि दलित-ओबीसी और मुसलमान वोट दोनों पार्टी के कॉमन हैं. ऐसे में कांग्रेस के प्रति रूझान बढ़ा तो आरजेडी को इसका नुकसान होगा. इसके संकेत लोकसभा चुनाव से मिलने लगे थे. मुस्लिम मतदाताओं के पास बिहार में आरजेडी के अलावा और विकल्प नहीं था. अब उसे वोटर अधिकार यात्रा से विकल्प मिल गया है.
कितना बदलेगा समीकरण?
लालू-तेजस्वी यादव की राजनीति हमेशा से MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण पर आधारित रही है, लेकिन कांग्रेस की सक्रियता से मुस्लिम वोटों में सेंध लगने का डर अब उन्हें सताने लगा है. इस मामले में आरजेडी को जेडीयू और बीजेपी नुकसान नहीं पहुंचा पाई. कांग्रेस सहयोगी पार्टी, फिर भी आरजेडी को नुकसान होने के संकेत हैं, इसे लालू यादव और तेजस्वी के लिए गंभीरता लेना होगा.
आरजेडी को कांग्रेस की कितनी जरूरत?
अब तक महागठबंधन में RJD का पलड़ा भारी रहा है, लेकिन 1990 के बाद से बिहार में आरजेडी की पिछलग्गू पार्टी की तरह थी, पर इस बार वैसा नहीं है. वोटर अधिकार यात्रा उसे बिहार में आरजेडी के समकक्ष ला खड़ कर सकती है. इसका लाभ कांग्रेस जरूर उठाना चाहेगी. कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि सीट बंटवारे के समय कांग्रेस इस आधार पर ज्यादा हिस्सेदारी की मांग कर सकती है. यानी RJD को अब अपनी रणनीति पर दोबारा विचार करना होगा.
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक राहुल गांधी की इस यात्रा से कांग्रेस ने दरभंगा, मधुबनी और अररिया जैसे आरजेडी के गढ़ सहित कई मुस्लिम बहुल निर्वाचन क्षेत्रों में भी बढ़त हासिल हुई है. राज्य में कांग्रेस का पतन 1989 के भागलपुर दंगों से निपटने में कथित विफलताओं के बाद शुरू हुआ, जिसके कारण मुस्लिम मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग जनता दल और बाद में आरजेडी से जुड़ गया. 1990 में अपने पहले कार्यकाल के लिए मुख्यमंत्री बनने के बाद लालू राज्य में अल्पसंख्यक समुदाय के प्रमुख नेता बन गए. अब राहुल गांधी द्वारा वोटर अधिकार यात्रा शुरू करने से पहले जिस कांग्रेस को महागठबंधन की 'कमज़ोर कड़ी' कहा जाता था, वही अब भारी भीड़ जुटाने का जरिया बन गया है.
1990 के बार कांग्रेस का हाल
बिहार कांग्रेस की हालत 1990 विधानसभा चुनाव के बाद से कमजोर हुई. या फिर यूं कहें कि कांग्रेस धीरे—धीरे बिहार की राजनीति से जमीनी आधार खो चुकी थी. लालू प्रसाद यादव का सत्ता में आने से सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस का ही हुआ बिहार विधानसभा चुनाव 2000 कांग्रेस को सिर्फ 23 सीटें मिलीं थी. इसके बाद पार्टी लालू के नेतृत्व वाले आरजेडी में शामिल हो गई. 2010 में भी कांग्रेस चुनाव लड़ी, जिसका नुकसान उसे उठाना पड़ा. साल 2015 के चुनावों में देश की सबसे पुरानी पार्टी का प्रदर्शन बेहतर हुआ जब जेडीयू सुप्रीमो और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार महागठबंधन में शामिल हुए. उस समय कांग्रेस ने 27 सीटें हासिल करने में सफल हुई.
2020 में हार के लिए कांग्रेस को माना गया जिम्मेदार
बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में जब नीतीश एनडीए में वापस आए तब कांग्रेस 70 सीटों पर चुनाव लड़ी और केवल 19 सीटें ही जीत पाई. जबकि उसकी सहयोगी आरजेडी 144 सीटों पर चुनाव लड़कर 75 सीटों पर जीत हासिल करने में सफल हुई और सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. एनडीए 125 सीटें जीतकर सत्ता में लौटी, जबकि महागठबंधन को 110 सीटें मिलीं. महागठबंधन की इस मामूली हार के लिए कांग्रेस के कमजोर प्रदर्शन को जिम्मेदार माना गया. इस कांग्रेस मजबूती के साथ चुनाव लड़ने का इरादा जाहिर कर चुकी है.राहुल गांधी इस बार चुनाव में इंटरेस्ट ले रहे है।.
तेजस्वी का नहीं रहा क्रेज, राहुल के प्रति बढ़ा रुझान - अनवर हुसैन
बिहार आरजेडी के नेता अनवर हुसैन का कहना है कि 1990 में कांग्रेस के कमजोर होने के बाद मुस्लिम वोटर आरजेडी के लिए फ्यूल बन गए. नीतीश कुमार इसके विकल्प बन सकते थे, लेकिन बीजेपी की ओर उनके झुकाव की वजह से नहीं बन पाए. इसके बावजूद बिहार में नीतीश ने मुसलमानों के लिए जो किया, वो आरजेडी कभी नहीं कर पाई. तेजस्वी यादव का प्रति क्रेज मुस्लिम मतदाताओं को साल 2020 के चुनाव में था, जो अब नहीं है.
आरजेडी ने यादवों के साथ मुसलमानों को भी सशक्त बनाने का वादा किया था, लेकिन पिछले 35 वर्षों में आरजेडी नेताओं ने केवल यादव समुदाय का भला किया. इसके बावजूद मुसलमान आरजेडी से इसलिए जुड़े रहे कि उन्हें और कोई विकल्प नहीं अभी तक नहीं मिला था. मुसलमान मतदाता बीजेपी को वोट नहीं दे सकते.
लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को पहले की तुलना में मजबूती मिलने और यूपी में अखिलेश यादव के उदय ने मुसलमानों में आस जगाई है. उसी का नतीजा है कि वोटर अधिकार यात्रा के जरिए राहुल गांधी ने मुस्लिम, दलित और कुछ अन्य मतदाताओं को खुद से जोड़ा है. ऐसे में मुस्लिम वोट बैंक कांग्रेस के पक्ष में जा सकती है.
चूंकि बीजेपी इस समय बिहार में डिफेंसिव मूड में है. बीजेपी का चुनाव आयोग के पक्ष में आना भी प्रदेश के मतदाताओं को अच्छा नहीं लगा है. वोट अधिकार यात्रा के दौरान राहुल गांधी के सामने तेजस्वी और अखिलेश दोनों का कद छोटा पड़ता दिखाई दिया. आने वाले दिनों में यात्रा का असर कांग्रेस के लिए साउथ टू नॉर्थ देखा जा रहा है.
जातिवादी और विवादित बयान देने वाला वरिष्ठ आईएएस अधिकारी संतोष वर्मा
एमपी के वरिष्ठ IAS अधिकारी संतोष वर्मा इन दिनों अपने विवादित बयान को लेकर सुर्खियों में हैं. अजाक्स के एक कार्यक्रम में उन्होंने आरक्षण और जाति पर टिप्पणी करते हुए कहा कि आरक्षण तब तक चले जब तक कोई ब्राह्मण अपनी बेटी दान में न दे. यह बयान सामने आते ही सोशल मीडिया पर बवाल मच गया. ब्राह्मण संगठनों, कई राजनीतिक नेताओं और सामाजिक समूहों ने इसे जातिगत टिप्पणी बताते हुए कड़ी कार्रवाई की मांग की है. वहीं, संतोष वर्मा ने सफाई देते हुए कहा कि उनके बयान को तोड़ा-मरोड़ा गया है और उद्देश्य जातिवाद के खिलाफ संदेश देना था.
आईएएस संतोष वर्मा का बयान सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है. उनका बयान सामने आने के बाद ब्राह्मण समाज ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. इस बयान के बाद ब्राह्मण समाज में बहुत नाराजगी है और माफी या सफाई की मांग उठी है.
संतोष वर्मा ने क्या कहा था?
एमपी कैडर के आईएएस अधिकारी संतोष वर्मा ने कहा है कि 'आरक्षण तब तक जारी रहे जब तक कोई ब्राह्मण अपनी बेटी उनके बेटे को दान ना कर दे या उससे संबंध ना बनाए.' संतोष वर्मा ने यह टिप्पणी अनुसूचित जाति, जनजाति अधिकारी कर्मचारी संघ (अजाक्स) के प्रांतीय अधिवेशन में 23 नवंबर को यह टिप्पणी की थी.
खत्म कर दीजिए जाति
वरिष्ठ आईएएस अधिकारी संतोष वर्मा को वायरल वीडियो में मंच से कह रहे हैं, 'मैं तब तक यह नहीं मानूंगा कि एक परिवार में एक व्यक्ति को आरक्षण मिलना चाहिए, जब तक मेरे बेटे को कोई ब्राह्मण अपनी बेटी दान ना कर दे या उसका उससे संबंध नहीं बनाए. केवल आर्थिक आधार की बात है तो- जब तक यह रोटी-बेटी का व्यवहार ना होता, तब तक हमको समाज के पिछड़ेपन, सामाजिक पिछड़ेपन के कारण आरक्षण की पात्रता मिलती रहेगी. आप खत्म कर दीजिए जाति- हमें नहीं चाहिए आरक्षण.'
एमपी सरकार से कार्रवाई की मांग
आईएएस अधिकारी के बयान से ब्राह्मण और सवर्ण संगठनों ने नाराजगी जाहिर की है और सरकार से कार्रवाई की मांग की है. ब्राह्मण सभा मध्य प्रदेश के अध्यक्ष डॉ. शैलेंद्र व्यास ने कहा कि यह तुच्छ सोच है. उन्होंने कहा कि इस तरह की मानसिकता वाले अधिकारियों पर कार्रवाई होनी चाहिए.
कौन हैं संतोष वर्मा?
संतोष कुमार वर्मा मध्य प्रदेश काडर के 2012 के बैच के आईएएस अधिकारी हैं. वह किसान कल्याण और कृषि विकास विभाग में उप सचिव पद पर कार्यरत हैं. हाल ही में उन्हें अजाक्स का प्रांतीय प्रमुख भी चुना गया है. वह संघ के सामाजिक न्याय और पिछड़े तबकों के अधिकारों को लेकर सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं.
संतोष वर्मा पर आरोप है कि उन्होंने फर्जी कोर्ट ऑर्डर बनाकर IAS में प्रमोशन हासिल किया था. जांच में पाया गया कि उन्होंने अक्विटल ऑर्डर की फर्जी प्रतियां पेश की थीं. इसके बाद मध्य प्रदेश पुलिस ने उन्हें IPC की विभिन्न धाराओं जैसे धोखाधड़ी, जालसाजी में गिरफ्तार किया था.
हाल ही में उन्होंने ब्राह्मण समाज को लेकर विवादित बयान दिया है. उन्होंने कहा था कि आरक्षण तब तक चले जब तक कोई ब्राह्मण अपनी बेटी दान में न दे या उनके बेटे से संबंध न बनाए. बाद में संतोष वर्मा ने अपना बयान स्पष्ट करते हुए कहा कि उनका असल उद्देश्य जातिगत विभाजन को मिटाना है और उन्होंने डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों का हवाला दिया. उनके आरक्षण-संबंधित बयान ने सामाजिक संवेदनशीलता और जातिगत विभाजन को फिर से बहस में ला दिया है.