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Immunity: अक्सर लोग सोचते हैं कि इम्युनिटी यानी रोग-प्रतिरोधक क्षमता हमेशा एक जैसी रहती है. या तो मजबूत या फिर कमजोर. लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि ऐसा नहीं है. हमारी इम्युनिटी लगातार ऊपर-नीचे होती रहती है. कभी यह बहुत मजबूत होती है और कभी अचानक गिर भी जाती है. इस उतार-चढ़ाव को वैज्ञानिक “इम्युनिटी ड्रॉप कर्व” कहते हैं.
2021 में नेचर रिव्यूज इम्युनोलॉजी में प्रकाशित शोधों के मुताबिक, शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कभी भी स्थिर नहीं रहती. यह लगातार ऊपर-नीचे होती रहती है और कभी-कभी अचानक गिर भी जाती है. यही कारण है कि समान वातावरण में रहने वाले दो लोग एक ही वायरस से अलग-अलग प्रभावित होते हैं. 'इम्युनिटी ड्रॉप कर्व' को मौसम के हिसाब से देखें तो यह सबसे स्पष्ट रूप से सर्दियों में दिखाई देता है.
हार्वर्ड मेडिकल स्कूल की 2020 की शोध बताती है कि ठंड बढ़ते ही शरीर में विटामिन डी का स्तर गिरता है, नाक की म्यूकोसा परत कमजोर पड़ती है और वायरस हवा में अधिक देर सक्रिय रहते हैं. इससे हमारी इम्युनिटी की कर्व नीचे की ओर झुकने लगती है. यही वजह है कि फ्लू, वायरल फीवर और सर्दी-जुकाम के मामले नवंबर से फरवरी के बीच कई देशों में अपने चरम पर पहुंच जाते हैं.
उम्र भी इस कर्व का एक बड़ा घटक है, जैसा कि स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की 2019 में की गई स्टडी बताती है. इस अध्ययन से पता चलता है कि 40 की उम्र के बाद टी सेल्स इम्यून कोशिकाएं धीमी हो जाती हैं और 60 के बाद यह गिरावट तेज हो जाती है. इसका मतलब यह है कि उम्र बढ़ने के साथ कर्व की "डाउनवर्ड स्लोप" ज्यादा बार और ज्यादा गहरी दिखाई देती है. यही कारण है कि बड़े लोग एक वायरस के प्रभाव में अधिक जल्दी आते हैं और युवा जल्दी रिकवर कर लेते हैं.
दिलचस्प बात यह है कि इम्युनिटी ड्रॉप कर्व सिर्फ प्राकृतिक कारणों से नहीं बनता. यह हमारी जीवनशैली के माइक्रो-फैक्टर्स से भी प्रभावित हो जाता है. एक स्टडी में पाया गया कि भोजन में सल्फर-समृद्ध सब्जियों, हाई-फाइबर और एंटीऑक्सिडेंट की कमी आंतों के माइक्रोबायोम को कमजोर कर देती है. क्योंकि लगभग 70 फीसदी इम्युनिटी आंत से नियंत्रित होती है, इसलिए खानपान में छोटी गलतियां भी कर्व में डिप ला सकती हैं.
संक्रमण का दबाव इस कर्व को हमेशा बदलता रहता है. शरीर पहली बार जब किसी वायरस से लड़ता है, तो कर्व गहराई तक गिरता है, लेकिन रिकवरी के साथ यह अचानक ऊपर उठ जाता है. इसे इम्यून बूस्ट फेज कहा जाता है. यही पैटर्न कोविड-19 में स्पष्ट रूप से देखा गया, जहां हल्के संक्रमण के बाद भी कुछ सप्ताह तक प्रतिरोधक क्षमता अस्थिर बनी रही.