(प्रतीकात्मक तस्वीर)
New GST Slab 2025-26: नई दिल्ली में बुधवार (3 सितंबर) को हुई वस्तु एवं सेवा कर (GST) काउंसिल की 56वीं बैठक में आम जनता, उद्योगों और किसानों के लिए कई अहम फैसले लिए गए. बैठक की अध्यक्षता केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने की. इस बैठक के बाद उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस में जानकारी दी कि जीएसटी प्रणाली को सरल और प्रभावी बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया गया है. अब देश में सिर्फ दो प्रमुख जीएसटी स्लैब- 5 फीसदी और 18 फीसदी रहेंगे. इसके अलावा विलासिता और हानिकारक वस्तुओं के लिए अलग से 40 फीसदी का एक विशेष टैक्स स्लैब रखा गया है.
12% और 28% स्लैब को किया गया समाप्त
वित्त मंत्री ने स्पष्ट किया कि 12 फीसदी और 28 फीसदी वाले टैक्स स्लैब को खत्म कर दिया गया है. इन स्लैब्स में पहले कई जरूरी वस्तुएं आती थीं. अब इनकी दरों को या तो घटाकर 5 फीसदी कर दिया गया है या फिर इन्हें 18 फीसदी में समाहित किया गया है. इसके साथ ही कई दैनिक उपयोग की वस्तुएं और आवश्यक उत्पाद ऐसे भी हैं, जिन पर अब कोई जीएसटी नहीं लगेगा. यह नई कर संरचना पूरे देश में 22 सितंबर 2025 से लागू होगी.
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आभार जताते हुए कहा कि उनके नेतृत्व में जीएसटी सुधार को प्राथमिकता दी गई. उन्होंने यह भी बताया कि जीएसटी में बदलाव को लेकर सभी राज्यों के वित्त मंत्रियों ने समर्थन दिया, जिससे यह फैसला सर्वसम्मति से लिया जा सका.
आम आदमी को राहत देने वाला निर्णय
निर्मला सीतारमण ने बताया कि यह पूरा सुधार आम जनता को ध्यान में रखकर किया गया है. दैनिक उपयोग की वस्तुओं पर लगने वाले टैक्स की व्यापक समीक्षा की गई और ज्यादातर मामलों में दरों में भारी कटौती की गई है. खासकर मध्यम वर्ग और गरीब तबके को राहत देने के लिए कई जरूरी सामानों को 5 फीसदी या शून्य टैक्स के दायरे में लाया गया है.
किन वस्तुओं पर कितना जीएसटी लगेगा?
5 फीसदी GST वाले उत्पाद
अब 5 फीसदी जीएसटी के अंतर्गत वे सभी वस्तुएं शामिल की गई हैं जो आम आदमी के दैनिक जीवन में उपयोग होती हैं. इनमें हेयर ऑयल, टॉयलेट सोप, साबुन की टिकिया, शैंपू, टूथब्रश और टूथपेस्ट जैसे व्यक्तिगत देखभाल के उत्पाद शामिल हैं. इसके अलावा साइकिल, टेबलवेयर, किचनवेयर और अन्य घरेलू सामान भी इस श्रेणी में रखे गए हैं.
खाद्य पदार्थों की बात करें तो नमकीन, भुजिया, सॉस, पास्ता, इंस्टेंट नूडल्स, चॉकलेट, कॉफी, संरक्षित मांस, कॉर्नफ्लेक्स, मक्खन और घी जैसे रोजमर्रा के उपभोग वाले उत्पादों पर भी अब केवल 5 फीसदी जीएसटी लगेगा। इन बदलावों से आम उपभोक्ताओं को महंगाई से राहत मिलने की उम्मीद है.
शून्य फीसदी GST वाले उत्पाद
शून्य फीसदी जीएसटी के दायरे में अब वे वस्तुएं शामिल कर दी गई हैं जो आमतौर पर हर घर की जरूरत होती हैं. इनमें दूध, ब्रेड, छेना और पनीर जैसे आवश्यक खाद्य पदार्थ प्रमुख हैं. इसके अलावा सभी प्रकार की भारतीय रोटियों को भी पूरी तरह से जीएसटी से मुक्त कर दिया गया है। चाहे वह सादी रोटी हो, पराठा हो या अन्य कोई प्रकार, अब इन पर कोई टैक्स नहीं लगेगा। इस निर्णय से विशेष रूप से मध्यम वर्ग और निम्न आय वर्ग को सीधा लाभ मिलेगा और उनकी रसोई पर खर्च कम होगा.
18 फीसदी स्लैब में शामिल हैं ये उत्पाद
जीएसटी दरों में किए गए बदलाव के तहत अब कई महंगे उपकरणों और वाहनों को 28 फीसदी से घटाकर 18 फीसदी स्लैब में लाया गया है. इनमें एयर कंडीशनर, टीवी और डिशवॉशर जैसी घरेलू उपयोग की मशीनें शामिल हैं, जो पहले 28 फीसदी जीएसटी के अंतर्गत आती थीं. इसके अलावा छोटी कारें और मोटरसाइकिलें भी अब 18 फीसदी जीएसटी स्लैब में रखी गई हैं. इस बदलाव से उपभोक्ताओं को इन वस्तुओं की खरीद पर सीधी लागत में कमी का फायदा मिलेगा, जिससे इनकी मांग बढ़ने की संभावना है.
हेल्थ सेक्टर में बड़ी राहत
स्वास्थ्य क्षेत्र में आम जनता को बड़ी राहत देते हुए सरकार ने 33 जीवन रक्षक दवाओं पर लगने वाला जीएसटी पूरी तरह से समाप्त कर दिया है. पहले इन दवाओं पर 12 फीसदी की दर से जीएसटी वसूला जाता था, जो अब शून्य कर दिया गया है. इस फैसले से गंभीर बीमारियों का इलाज करा रहे मरीजों और उनके परिवारों को आर्थिक बोझ से राहत मिलेगी, साथ ही आवश्यक दवाओं की उपलब्धता और वहनयोग्यता भी बेहतर होगी.
किसानों को क्या मिलेगा?
कृषि और किसानों के हित में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए सरकार ने कई कृषि उपकरणों पर जीएसटी दर को 12 फीसदी से घटाकर 5 फीसदी कर दिया है. इसमें ट्रैक्टर, खेत की मिट्टी तैयार करने वाली मशीनें, कटाई और थ्रेशिंग मशीनें शामिल हैं. इसके अलावा पुआल बेलर, घास काटने की मशीन और खाद बनाने की मशीन जैसे उपकरण भी अब कम जीएसटी दर के अंतर्गत आएंगे। इस फैसले से किसानों की खेती-किसानी से जुड़ी लागत में कमी आएगी और आधुनिक कृषि उपकरणों की खरीद उनके लिए और अधिक सुलभ हो सकेगी.
जैव-कीटनाशकों पर छूट
सरकार ने पर्यावरण अनुकूल खेती को बढ़ावा देने और किसानों को राहत देने के उद्देश्य से 12 विशेष प्रकार के जैव-कीटनाशकों पर जीएसटी दर को 12 फीसदी से घटाकर 5 फीसदी कर दिया है. इस निर्णय से जैविक और सतत खेती को बढ़ावा मिलेगा, साथ ही किसानों की उत्पादन लागत में भी कमी आएगी. जैव-कीटनाशकों के इस्तेमाल से मिट्टी की गुणवत्ता बनी रहती है और फसलों की पैदावार पर भी सकारात्मक असर पड़ता है, जिससे दीर्घकालिक रूप से कृषि क्षेत्र को लाभ होगा.
अर्थव्यवस्था को मिलेगी रफ्तार
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बताया कि श्रम प्रधान उद्योगों, कृषि क्षेत्र और स्वास्थ्य सेवाओं को विशेष रूप से ध्यान में रखते हुए ये बदलाव किए गए हैं. इससे देश की आर्थिक गति को भी बल मिलेगा. साथ ही, मध्यम वर्ग की आर्थिक स्थिति को सुधारने की दिशा में यह एक सकारात्मक पहल मानी जा रही है.
जीएसटी काउंसिल की यह 56वीं बैठक ऐतिहासिक साबित हुई, क्योंकि इसमें टैक्स प्रणाली को सरल बनाकर आम आदमी, किसान, और उद्योग जगत को राहत देने वाले निर्णय लिए गए. टैक्स स्लैब्स की संख्या घटाकर दो करना, टैक्स दरों में कमी और आवश्यक वस्तुओं पर शून्य जीएसटी लगाना इस बात का संकेत है कि सरकार आम जनजीवन को आर्थिक रूप से सहज बनाने के लिए प्रतिबद्ध है. आगामी 22 सितंबर 2025 से ये सभी बदलाव लागू हो जाएंगे, जिसका सीधा फायदा देश के हर नागरिक को मिलेगा.
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(फाइल फोटो)
India Action on Trump Tariffs: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के जरिये भारत पर हाल ही में लगाए गए अतिरिक्त 25 फीसदी टैरिफ पेनाल्टी के बावजूद, भारत रूस से कच्चे तेल की खरीद बढ़ाने की योजना बना रहा है. ट्रंप का यह कदम यूक्रेन युद्ध को लेकर पुतिन पर दबाव डालने की रणनीति का हिस्सा है, लेकिन अब तक उनके प्रयास असफल साबित हुए हैं.
भारत रूस से तेल खरीदने में तेजी लाएगा
समाचार एजेंसी रायटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, भारत अगस्त की तुलना में सितंबर में रूस से तेल की खरीद में 10 से 20 फीसदी तक इजाफा कर सकता है. यह फैसला ऐसे समय में आया है जब यूक्रेन की तरफ से किए गए हालिया ड्रोन हमलों में रूसी रिफाइनरी को काफी नुकसान हुआ है और उसकी प्रोसेसिंग क्षमता कम हो गई है. इसके चलते रूसी एक्सपोर्टर्स ने तेल की कीमतों में कटौती की है ताकि निर्यात बढ़ाया जा सके.
भारत ने 2022 में मॉस्को पर लगे पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद से रूस का सबसे बड़ा तेल खरीदार बनकर खुद को ऊर्जा की दृष्टि से मजबूत किया है. सस्ते तेल ने भारतीय रिफाइनर्स को घरेलू बाजार में तेल की कीमतें नियंत्रण में रखने में मदद की, हालांकि इसका लाभ सीधे आम जनता तक पहुंच नहीं पाया, जिसके चलते आलोचना भी हुई.
ट्रंप प्रशासन का आर्थिक दबाव
ट्रंप प्रशासन ने 27 अगस्त 2025 से भारतीय सामान जैसे कपड़े, ज्वैलरी पर 50 फीसदी तक टैरिफ बढ़ा दिया है, जो भारत के लिए आर्थिक दबाव का बड़ा कदम माना जा रहा है. अधिकारियों का कहना है कि अभी भी टैरिफ विवाद को लेकर बातचीत जारी है.
भारत की रणनीति और वैश्विक कूटनीति
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार रूस और चीन के साथ अपने संबंधों को मजबूत करने में जुटे हुए हैं. तेल की खरीद बढ़ाना भारत की ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक कूटनीति दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है. दूसरी तरफ भारत के जरिये टैरिफ की मार से बचने के लिए उठाए जा रहे कदमों को देखकर ट्रंप प्रशासन पर दबाव बढ़ गया.
विशेषज्ञों के अनुसार, यह कदम भारत को अमेरिकी टैरिफ के दबाव से बचाने और घरेलू ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में मदद करेगा. इस कदम से स्पष्ट हो गया है कि भारत अपनी ऊर्जा रणनीति और अंतरराष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए किसी भी दबाव के बावजूद आत्मनिर्भर और संतुलित कदम उठा रहा है. अमेरिका की टैरिफ पेनाल्टी के बावजूद भारत रूस से तेल खरीद बढ़ा रहा है. सस्ते तेल और वैश्विक रणनीति के तहत पीएम मोदी की कूटनीतिक चाल जारी.
प्रतीकात्मक तस्वीर
Gold Price Today: त्योहारी सीजन की दस्तक से पहले सोने की चमक भले ही थोड़ी फीकी पड़ी हो, लेकिन खरीदारों के चेहरे खिल उठे हैं. बीते दस दिनों में सोने की कीमतों में आई 2 फीसदी की गिरावट ने उन लोगों को राहत दी है जो लंबे समय से बड़ी खरीदारी का इंतजार कर रहे थे. रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचे दाम अब धीरे-धीरे नीचे आ रहे हैं और बाजार में फिर से रौनक लौटने लगी है.
दरअसल, बीते कुछ दिनों में अंतरराष्ट्रीय हालात में स्थिरता और घरेलू बाजार में सुधार के चलते सोने की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई है. बीते 10 दिनों में सोना करीब 2 फीसदी यानी 2,160 रुपये प्रति 10 ग्राम सस्ता हुआ है, जिससे त्योहारों से पहले खरीदारों को राहत मिली है.
अगस्त से अक्टूबर के बीच गणेश चतुर्थी, नवरात्रि और दिवाली जैसे त्योहार आते हैं. जिनमें पारंपरिक रूप से सोने की मांग अधिक रहती है. हाल ही में सोना रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गया था, जिस कारण लोग कीमतों में गिरावट का इंतजार कर रहे थे. अब दाम कुछ कम होने पर खरीदार एक बार फिर सक्रिय हो रहे हैं.
आज के सोने के भाव (प्रति 10 ग्राम):
कैरेट आज का भाव कल का भाव
24 कैरेट ₹1,00,750 ₹1,01,180
22 कैरेट ₹92,350 ₹92,750
18 कैरेट ₹75,560 ₹75,890
शहरों के अनुसार सोने का भाव (24 कैरेट)
दिल्ली – ₹1,00,090
मुंबई – ₹1,00,750
चेन्नई – ₹1,00,750
कोलकाता – ₹1,00,750
22 कैरेट और 18 कैरेट में भी सभी शहरों में मामूली गिरावट देखने को मिली है.
किन कारणों से घटती-बढ़ती है सोने की कीमत?
अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतें डॉलर में तय होती हैं. अगर डॉलर मजबूत होता है या रुपया कमजोर होता है, तो भारत में सोना महंगा हो जाता है. भारत में सोने का अधिकतर हिस्सा आयात होता है. अगर सरकार इंपोर्ट ड्यूटी या टैक्स बढ़ा देती है, तो सोना महंगा हो सकता है. वैश्विक तनाव, युद्ध, मंदी या शेयर बाजार की गिरावट जैसे कारणों से निवेशक सोने की ओर रुख करते हैं, जिससे मांग बढ़ती है और दाम चढ़ते हैं.
भारतीय परंपरा और मांग
शादियों और त्योहारों में सोना खरीदना शुभ माना जाता है, जिससे इन मौकों पर इसकी मांग बढ़ जाती है. सोने को महंगाई के दौर में सुरक्षित निवेश माना जाता है. जब महंगाई बढ़ती है, लोग सोने में निवेश करते हैं जिससे इसकी कीमतें ऊपर जाती हैं.
क्या आगे और गिरेगा सोना?
चूंकि त्योहारी सीजन शुरू होने वाला है और मांग धीरे-धीरे बढ़ रही है, इसलिए कीमतों में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि खरीदारों को अभी थोड़ी राहत मिल रही है, लेकिन लंबी अवधि में कीमतें फिर से ऊंचाई छू सकती हैं.
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(फाइल फोटो)
Tarrif Impact on Indian Market: भारतीय शेयर बाजार अगस्त में दोहरी मार झेल रहा है. एक ओर सेंसेक्स में गिरावट थमने का नाम नहीं ले रही, तो दूसरी ओर विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) ने अब तक की सबसे तेज निकासी कर बाजार की कमर तोड़ दी है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के जरिये भारतीय निर्यात पर 50 फीसदी टैरिफ लगाने का असर निवेशकों की धारणा पर साफ दिखाई दे रहा है.
अगस्त 2025 में एफपीआई की बिकवाली का आंकड़ा 34,993 करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जो फरवरी के बाद किसी भी महीने में सबसे बड़ी निकासी है. जुलाई में जहां 17,741 करोड़ रुपये बाजार से निकाले गए थे, वहीं अगस्त में यह आंकड़ा दोगुना हो गया. कुल मिलाकर, साल 2025 में एफपीआई ने अब तक 1.3 लाख करोड़ रुपये की निकासी कर दी है.
वैल्यूएशन और ग्लोबल टैरिफ दोनों जिम्मेदार
मार्केट विशेषज्ञ मानते हैं कि इस निकासी के पीछे केवल घरेलू बाजार में हाई वैल्यूएशन जिम्मेदार नहीं है, बल्कि वैश्विक स्तर पर टैरिफ से उपजे तनाव ने भी निवेशकों का भरोसा कमजोर किया है. फरवरी 2025 के बाद पहली बार इतने बड़े स्तर पर विदेशी निवेशकों ने पैसा बाहर निकाला. हालांकि, प्राइमरी मार्केट यानी IPO सेगमेंट में एफपीआई ने अब भी भरोसा दिखाया है और इस साल अब तक 40,305 करोड़ रुपये का निवेश किया है.
टैरिफ ने बिगाड़ा सेंटीमेंट
मॉर्निंगस्टार इन्वेस्टमेंट के हिमांशु श्रीवास्तव का कहना है कि अमेरिकी टैरिफ ने निवेशकों की धारणा पर नकारात्मक असर डाला है. इससे भारत की ग्रोथ स्टोरी को लेकर शंका बढ़ी है और व्यापारिक रिश्तों पर दबाव भी गहराया है. इसके अलावा जून तिमाही के कमजोर कॉरपोरेट नतीजों ने भी एफपीआई को और हतोत्साहित किया.
ट्रंप टैरिफ और बिकवाली के दबाव का असर बीते हफ्ते सेंसेक्स में भी दिखा. इंडेक्स 1,497 अंक गिर गया और शीर्ष-10 कंपनियों में से आठ की मार्केट वैल्यू घटकर 2.24 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो गई. सबसे ज्यादा झटका रिलायंस इंडस्ट्रीज और एचडीएफसी बैंक के निवेशकों को लगा.