रांची में खेले गए पहले मैच में कोहली ने 102 गेंदों में 135 रन बनाते हुए अपने 52वां वनडे शतक जड़ा.
विराट कोहली ने दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ रांची में पहले ODI में धमाकेदार 135 रनों की पारी खेलकर अपना 52वां ODI शतक पूरा किया. शतक से भारत को जीत मिली, लेकिन उनकी टेस्ट वापसी को लेकर बने कयासों पर कोहली ने साफ मना कर दिया है- वह फिलहाल केवल ODI खेलना चाहते हैं.
भारत के दिग्गज बल्लेबाज विराट कोहली फिर से सुर्खियों में हैं. 30 नवंबर 2025 को हुए पहले वनडे में उन्होंने 135 रनों की धमाकेदार पारी खेली और अपना 52वां ODI शतक जड़कर टीम को अहम जीत दिलाई. इस करिश्माई पारी ने कोहली को रिकॉर्ड-ब्रेकिंग बैटर की पंक्ति में खड़ा कर दिया, लेकिन टेस्ट क्रिकेट में उनकी वापसी को लेकर बनी चर्चाओं पर उन्होंने फिलहाल साफ मना कर दिया है.पिछले कुछ समय से लगातार पूछा जा रहा था. क्या वह टेस्ट क्रिकेट में वापसी करेंगे?
पहले वनडे में 135 रनों की शानदार पारी खेलने और मैन ऑफ द मैच बनने के बाद कोहली ने साफ कहा कि वह फिलहाल सिर्फ वनडे फॉर्मेट पर ही फोकस कर रहे हैं. “बस ऐसे ही रहने वाला है, मैं सिर्फ एक ही फॉर्मेट खेल रहा हूं,” कोहली का यह बयान उनकी भविष्य की योजनाओं को बिल्कुल साफ कर देता है.
कोहली ने साफ किया स्टैंड
रांची में खेले गए पहले मैच में कोहली ने 102 गेंदों में 135 रन बनाते हुए अपने 52वां वनडे शतक जड़ा. इसी के साथ उन्होंने एक बार फिर बता दिया कि वह अभी भी सफेद गेंद के बादशाह हैं. उनकी पारी ने भारत को मजबूत स्थिति में पहुंचाया और टीम को आसान जीत दिलाई. पोस्ट मैच प्रेजेंटेशन में जब उनसे टेस्ट क्रिकेट में कमबैक को लेकर सवाल पूछा गया, तो कोहली ने बिना झिझक साफ कहा कि वह अब अपने शरीर और दिमाग की जरूरतों को समझते हैं और इस समय एक से ज्यादा फॉर्मेट खेलना उनके लिए संभव नहीं है.
हाल की रिपोर्टों पर लगा विराम
हाल ही में खबरें आई थीं कि बीसीसीआई कुछ अनुभवी खिलाड़ियों को टेस्ट टीम में वापस लाने की योजना बना रहा है, जिनमें कोहली का नाम भी शामिल बताया जा रहा था. हालांकि उनके इस बयान ने इन सभी चर्चाओं पर पूर्ण विराम लगा दिया है.
37 साल की उम्र में कोहली मानते हैं कि रिकवरी अब पहले जैसी नहीं है. उन्होंने बताया कि मैच से एक दिन पहले उन्होंने पूरी तरह आराम किया ताकि ऊर्जा बरकरार रहे. उन्होंने कहा कि उनकी सबसे बड़ी तैयारी मानसिक होती है. “जब तक दिमाग तेज है और शरीर फिट है, खेल आसान लगता है.”
'अनुभव ही सबसे बड़ा हथियार'-कोहली
कोहली ने कहा कि पिच शुरुआत में आसान लग रही थी, लेकिन बाद में स्लो हो गई. ऐसे में समझदारी, शॉट सिलेक्शन और अनुभव सबसे ज्यादा काम आया. उन्होंने यह भी कहा कि वह प्रैक्टिस पर भरोसा नहीं करते, बल्कि अपनी मानसिक ताकत और खेल के प्रति जुनून पर यकीन करते हैं. साफ है कि विराट कोहली का फोकस अब स्पष्ट है. वह वनडे क्रिकेट में अपना पूरा दमखम लगाएंगे और फिलहाल टेस्ट क्रिकेट में वापसी की कोई यो
सीजेआई बीआर गवई
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में पूर्व जज सुरेश्वर ठाकुर थे. उनके कई फैसले सुप्रीम कोर्ट में अपील किए गए थे. उनकी भाषा और तर्क शैली को न्यायिक विशेषज्ञों और वकीलों ने समझने में कठिन माना था. सुनवाई के दौरान CJI गवई ने कहा कि वह, “हर वह फैसला जिसे ठाकुर जज के द्वारा दिया गया था और जो सुप्रीम कोर्ट में चुनौती बनकर आया, उसे पलट दिया है.
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) बी.आर. गवई ने हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में एक विवादास्पद टिप्पणी की, जिसमें उन्होंने पूर्व पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट जज सुरेश्वर ठाकुर के फैसलों को केंद्र में रखा. गवई ने कहा कि ठाकुर के निर्णय ‘बहुत अस्पष्ट’ थे और उनकी भाषा इतनी जटिल थी कि सुप्रीम कोर्ट को उन्हें समझने में कठिनाइयां हुईं. उस बेंच की सुनवाई के दौरान उन्होंने यह भी खुलासा किया कि सुप्रीम कोर्ट ने चुनौती दिए गए लगभग सभी फैसलों को पलट दिया. इस पर उन्होंनं गहरा खेद भी व्यक्त किया, यह कहते हुए, “सौभाग्य है कि वे रिटायर हो गए.”
यह बयान न्यायपालिका में समीक्षा, जवाबदेही और फैसला देने की गुणवत्ता पर एक अहम बहस को फिर से हवा दे रहा है. पूर्व जज सुरेश्वर ठाकुर, पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में थे। उनके कई फैसले सुप्रीम कोर्ट में अपील किए गए थे. उनकी भाषा और तर्क शैली को न्यायिक विशेषज्ञों और वकीलों ने “समझने में कठिन” माना था.
CJI गवई का बयान
सुनवाई के दौरान CJI गवई ने कहा कि “हर वह फैसला जिसे ठाकुर जज के द्वारा दिया गया था और जो सुप्रीम कोर्ट में चुनौती बनकर आया, उसे पलटा गया.” उन्होंने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट के अन्य जजों को उन फैसलों को डिकोड (decode) करने में “बहुत कठिन समय” लगा. सौभाग्य है कि उन्होंने रिटायरमेंट ले लिया. यह उनकी बात न्यायपालिका में पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल उठाती है.
न्यायिक चिंताएं
विशेषज्ञों का कहना है कि ठाकुर के फैसलों की अस्पष्ट भाषा न सिर्फ कानूनी व्याख्या को मुश्किल बनाती थी, बल्कि न्यायिक समीक्षा प्रक्रिया में समय और संसाधन की बर्बादी भी हुई. यह मामला जजों की जवाबदेही, न्याय की गुणवत्ता और फैसलों की स्पष्टता जैसी बड़ी समृद्ध न्यायिक चुनौतियों को सामने लाता है.
कुछ का तर्क है कि जटिल और अस्पष्ट निर्णय न्याय पाने वालों के लिए परेशानियाँ बढ़ाते हैं, क्योंकि पुनरीक्षण या अपील की जरुरत पड़ती है, जिससे न्याय प्रक्रिया लंबी और महंगी हो सकती है.
प्रशांत किशोर
बिहार विधानसभा चुनाव में सबसे चर्चित मुकाबलों में से एक मानी जा रही राघोपुर सीट से अब प्रशांत किशोर चुनाव नहीं लड़ेंगे. जनसुराज अभियान की ओर से इस सीट पर नए उम्मीदवार की घोषणा कर दी गई है. यह फैसला राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है क्योंकि माना जा रहा था कि PK सीधे तेजस्वी यादव को चुनौती देंगे.
क्या कहा प्रशांत किशोर ने?
प्रशांत किशोर ने बुधवार को मीडिया से बातचीत में कहा, “राघोपुर की जनता को हम अकेला नहीं छोड़ सकते, लेकिन यह चुनाव प्रशांत किशोर बनाम तेजस्वी यादव नहीं होगा. यह जनसुराज बनाम पुरानी राजनीति की लड़ाई है.” उन्होंने कहा कि जनसुराज का मकसद किसी व्यक्ति को हराना नहीं, बल्कि राजनीति की दिशा बदलना है.
जनसुराज का उम्मीदवार कौन है?
जनसुराज ने राघोपुर सीट से राजीव कुमार को उम्मीदवार बनाया है, जो पिछले 15 सालों से इलाके में शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में सक्रिय हैं. पार्टी ने बताया कि वे गांव-गांव में जनसुराज अभियान का हिस्सा रहे हैं और जनता के बीच उनकी छवि एक ईमानदार सामाजिक कार्यकर्ता की है.
राजीव कुमार ने नामांकन से पहले कहा , “राघोपुर में अब जनता का शासन होगा, परिवारवाद की राजनीति नहीं.”
राघोपुर की सियासी अहमियत
राघोपुर सीट बिहार की राजनीति में हमेशा से VIP सीट रही है। लालू प्रसाद यादव खुद यहां से विधायक रह चुके हैं. बाद में तेजस्वी यादव ने भी इसी सीट से अपनी राजनीतिक पारी शुरू की और दो बार यहां से जीत दर्ज की. अब जनसुराज का नया उम्मीदवार मैदान में है, तो मुकाबला दिलचस्प जरूर होगा, भले ही PK खुद मैदान में न उतरें.
PK के पीछे हटने का क्या मतलब?
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि प्रशांत किशोर का खुद चुनाव न लड़ना उनकी रणनीति का हिस्सा है. वे राजनीतिक आंदोलन को व्यक्ति आधारित नहीं बनाना चाहते. दूसरा, इससे वे पूरे बिहार में अपनी भूमिका राज्यव्यापी प्रचारक और चेहरा के रूप में बनाए रखेंगे. साथ ही वे विपक्षी दलों के "PK बनाम तेजस्वी" नैरेटिव से भी खुद को बचा रहे हैं.
तेजस्वी यादव की प्रतिक्रिया
तेजस्वी यादव ने इस पर तीखा तंज कसते हुए कहा, “लोगों को मैदान में उतरने से डर लग रहा है. जनता सब देख रही है.” हालांकि RJD नेताओं ने माना कि PK के अभियान ने राघोपुर में माहौल जरूर बदला है और इस बार मुकाबला पहले से कठिन होगा.
देशभर में शिशु मृत्यु दर के ताज़ा आंकड़े चौंकाने वाले
देशभर में शिशु मृत्यु दर के ताज़ा आंकड़े चौंकाने वाले हैं. मध्य प्रदेश में नौनिहालों की सबसे ज़्यादा मौतें दर्ज हुईं, जबकि केरल ने बच्चों की जान बचाने में बेहतरीन प्रदर्शन किया. शहरी और ग्रामीण इलाकों के आंकड़े बताते हैं कि स्वास्थ्य सेवाओं में भारी असमानता बनी हुई है. ताजा रिपोर्ट बताती है कि जहां केरल ने बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं और जागरूकता से शिशुओं की जान बचाने में कामयाबी हासिल की है, वहीं मध्य प्रदेश अब भी फिसड्डी साबित हो रहा है. जबकि मध्य प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग का बजट केरल से दोगुना से भी अधिक है. यह छत्तीसगढ़ और उड़ीसा से भी अधिक है.
4 साल के बच्चों की सबसे कम मृत्यु केरल में
शून्य से 4 साल तक के बच्चों की मृत्यु के मामले में मध्य प्रदेश देश में उत्तर प्रदेश के बाद दूसरे स्थान पर है. जबकि 4 साल तक के बच्चों की मृत्यु के मामले में छत्तीसगढ़, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल की स्थिति मध्य प्रदेश से बेहतर है. सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम स्टेटिकल रिपोर्ट 2023 के अनुसार केरल में 4 साल तक के उम्र के बच्चों की मृत्यु सबसे कम दर्ज की गई. यहां 4 साल तक की उम्र के बच्चों की मृत्यु का प्रतिशत 1.3 रही है. वहीं 4 साल तक की उम्र के नौनिहालों की जान बचाने के मामले में केरल के बाद हिमाचल प्रदेश और पंजाब का नंबर आता है. दोनों राज्यों में डेथ रेट 2.3 प्रतिशत है. जबकि कर्नाटक में 3.7 प्रतिशत, महाराष्ट्र में 3.8 प्रतिशत और पंजाब में 3.9 प्रतिशत बच्चों की मृत्यु 4 साल की उम्र से पहले हो जाती है.
शहरी बनाम ग्रामीण
शहरी क्षेत्र में 0 से 4 साल आयु के बच्चों की कुल मौतों के मामलों में भले ही मध्य प्रदेश दूसरे स्थान पर है, लेकिन शहरी क्षेत्रों में 4 साल तक के बच्चों के मृत्यु मामले में 10.5 प्रतिशत के साथ एमपी देश में पहले स्थान पर है. जबकि उत्तर प्रदेश दूसरे नंबर पर है. यहां शहरी क्षेत्रों में 10.1 प्रतिशत 4 साल तक के बच्चों की मृत्यु होती है. तीसरे नंबर पर राजस्थान है, यहां का डेथ रेट 9.4 प्रतिशत है. बिहार में 9.4 प्रतिशत और छत्तीसगढ़ में 7.4 प्रतिशत बच्चे 4 साल तक का जीवन भी पूरा नहीं कर पाते हैं.
ग्रामीण क्षेत्रों में 4 साल की उम्र तक के बच्चों की मृत्यु के मामले में भी मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश के बाद दूसरे स्थान पर है. उत्तर प्रदेश में ग्रामीण क्षेत्रों का डेथ रेट 16.1 प्रतिशत, जबकि मध्य प्रदेश का 15.5 प्रतिशत है. राजस्थान तीसरे और चौथे स्थान पर झारखंड है. वहीं ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में सबसे कम डेथ रेट के मामले में केरल देश में प्रथम स्थान पर है.
लोगों को निराशा लगी हाथ
एमपी स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों का कहना है कि मध्य प्रदेश में मातृ-शिशु मृत्यु दर कम करने के लिए कई नवाचार किए जा रहे हैं. इसके लिए शहर के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में प्रशिक्षित डाक्टरों की संख्या बढ़ाई जा रही है. समय पर रेफरल और एंबुलेंस सेवाओं को मजबूत किया जा रहा है. इसके लिए ब्लॉक स्तर पर समर्पित मातृ-शिशु केंद्रों की स्थापना की जा रही है. पोषण, टीकाकरण और मातृ-शिशु स्वास्थ्य की सतत निगरानी की जा रही है.