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Lucky Birth Dates Astrology: न्यूमरोलॉजी में कहा जाता है कि जन्म की तारीख का हमारी ज़िंदगी की दिशा और किस्मत पर बहुत ज़्यादा असर पड़ता है. इसी तरह, कुछ खास तारीखों पर पैदा हुए लोग सच में बहुत भाग्यशाली माने जाते हैं. ये लोग न सिर्फ नाम कमाते हैं, बल्कि बहुत सारा पैसा भी जमा करते हैं. आइए जानते हैं कि ये कौन सी तारीखें हैं और इनकी क्या खास बातें हैं.
सबसे पहले, उन लोगों की बात करते हैं जिनकी जन्म तारीख 1, 10, 19 और 28 है. इन्हें रूट नंबर 1 वाले लोग कहा जाता है. ज्योतिष के अनुसार, यह सूर्य का नंबर है। ऐसे लोगों में जन्म से ही लीडरशिप क्वालिटी होती है. वे किसी भी काम में पीछे नहीं रहते. चाहे नौकरी हो या बिज़नेस, वे हमेशा आगे रहते हैं. उनकी सोच बड़ी होती है और वे हमेशा अपने तरीके से कुछ नया और अलग करने की कोशिश करते हैं. हार मानना उनके लिए कोई ऑप्शन नहीं है. वे जो भी करने का फैसला करते हैं, उसे पूरा करते हैं.
फिर आते हैं 2, 11, 20 और 29 तारीख को पैदा हुए लोग. इनका रूट नंबर 2 माना जाता है. ये लोग इमोशनल होते हैं, लेकिन साथ ही बहुत इंटेलिजेंट और शांति पसंद भी होते हैं. इनकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि ये आसानी से दोस्त बना लेते हैं और हर जगह अपनेपन का एहसास फैलाते हैं. इनमें सफलता पाने की कला होती है. ये आसानी से नाम और पैसा दोनों कमा लेते हैं.
अगर हम 3, 12, 21 और 30 तारीख को पैदा हुए लोगों की बात करें, तो उनका रूट नंबर 3 होता है. उनकी पर्सनैलिटी में एक जादू होता है. लोग उनके आस-पास खुश रहते हैं. वे बहुत क्रिएटिव होते हैं, और उनके दिमाग में हमेशा नए-नए आइडिया आते रहते हैं. वे अपने टैलेंट से अपनी किस्मत बदलते हैं और बहुत नाम कमाते हैं. उनकी बातों में ऐसा आकर्षण होता है कि लोग आसानी से उनके प्रभाव में आ जाते हैं. ज्योतिष के अनुसार, इन खास तारीखों पर पैदा हुए लोगों की किस्मत में पहले से ही सफलता और धन लिखा होता है. ये लोग किसी भी फील्ड में अपनी एक अलग पहचान बनाने में सफल होते हैं.
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Fennel Water Benefits: आजकल की व्यस्त जिंदगी में लोग सेहत का ख्याल रखना तो चाहते हैं, लेकिन समय की कमी और बाहर का खाना हमारी सेहत पर असर डालता है. ऐसे में सौंफ का पानी (Fennel Water) एक बेहद आसान और फायदेमंद घरेलू नुस्खा है, जिसे हमारी दादी-नानी भी नियमित पीने की सलाह देती थीं. आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान दोनों ही मानते हैं कि सौंफ के बीजों में ऐसे पोषक तत्व पाए जाते हैं जो शरीर को अंदर से मजबूत बनाते हैं. इनमें विटामिन A, विटामिन C, कैल्शियम, पोटेशियम, मैग्नीशियम, फॉस्फोरस और भरपूर एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं.
आयुर्वेद के मुताबिक, सौंफ शरीर की गर्मी को संतुलित रखने में मदद करती है और पाचन अग्नि यानी डाइजेशन को बेहतर बनाती है. रातभर पानी में सौंफ भिगोकर रख देने से उसमें मौजूद पोषक तत्व पानी में घुल जाते हैं. अगली सुबह इसे छानकर खाली पेट पीने से यह शरीर को ताजगी और ऊर्जा देता है. यह पेट के लिए बेहद लाभकारी माना जाता है क्योंकि यह गैस, अपच और कब्ज जैसी समस्याओं को कम कर सकता है. वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो सौंफ में मौजूद फाइबर और एंटी-ऑक्सीडेंट पाचन रसों को संतुलित रखते हैं और आंतों के कामकाज को बेहतर बनाते हैं. यही वजह है कि इसे डाइजेशन बूस्टर कहा जाता है.
दिल की सेहत के लिए भी सौंफ का पानी किसी वरदान से कम नहीं. इसमें पाए जाने वाले एंटी-ऑक्सीडेंट शरीर में खराब कोलेस्ट्रॉल को जमा होने से रोकते हैं और अच्छे कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाने में मदद करते हैं. इससे ब्लड सर्कुलेशन बेहतर होता है और हृदय रोगों का खतरा कम होता है. इसके साथ ही सौंफ का पानी ब्लड प्रेशर को भी नियंत्रित करने में मदद कर सकता है, क्योंकि इसमें पोटेशियम होता है, जो रक्त वाहिनियों को भी रिलैक्स करता है.
सौंफ के पानी का एक और बड़ा फायदा है रोग प्रतिरोधक क्षमता, यानी इम्यून सिस्टम को मजबूत करना. इसमें मौजूद एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटी-बैक्टीरियल गुण शरीर को संक्रमण से बचाने में मदद करते हैं. इसके नियमित सेवन से शरीर में मौजूद हानिकारक टॉक्सिन बाहर निकल जाते हैं, जिससे आप जल्दी बीमार नहीं पड़ते. यही वजह है कि मौसम बदलने के समय सौंफ का पानी पीना काफी फायदेमंद माना जाता है.
अगर आप वजन कम करने की कोशिश में हैं, तो सौंफ का पानी आपकी मदद कर सकता है. यह शरीर के मेटाबॉलिज्म को तेज करता है और चर्बी के जमाव को कम करने में मदद करता है. यही कारण है कि कई फिटनेस एक्सपर्ट सुबह खाली पेट सौंफ का पानी पीने की सलाह देते हैं. मुंह की बदबू की समस्या भी सौंफ से दूर की जा सकती है. सौंफ में मौजूद प्राकृतिक तेल मुंह में मौजूद बैक्टीरिया को खत्म करते हैं और सांसों को ताजगी देते हैं. इसके अलावा, यह मुंह के एसिड के स्तर को संतुलित रखता है, जिससे दांत और मसूड़े भी स्वस्थ रहते हैं.
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Fenugreek Seeds for Belly Fat: तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल के साथ-साथ लोगों की जीवनशैली भी बदल रही है. लंबे समय तक ऑफिस में बैठे रहना, कम फिजिकल एक्टिविटी और असंतुलित खान-पान ने मोटापे और उससे जुड़ी बीमारियों को तेज़ी से बढ़ाया है. इनमें सबसे बड़ी चिंता का कारण पेट की चर्बी या एब्डॉमिनल फैट है, जिसे विसरल फैट भी कहा जाता है. यह चर्बी पेट के अंगों को घेरकर उनके कामकाज को प्रभावित करती है और व्यक्ति में हार्ट डिज़ीज़, डायबिटीज़ और अन्य क्रॉनिक बीमारियों का खतरा बढ़ाती है.
डाइट और लाइफस्टाइल में बदलाव जरूरी
हार्वर्ड हेल्थ की रिपोर्ट बताती है कि पेट की चर्बी कम करना आसान नहीं होता, लेकिन सही आहार और नियमित व्यायाम से इसे घटाया जा सकता है. हेल्दी डाइट अपनाना, रोज़ाना कम से कम 30 मिनट वॉक, योग या किसी भी तरह की फिजिकल एक्टिविटी करना सबसे ज़रूरी कदम हैं.
मेथी दाना एक प्राकृतिक उपाय
भारतीय, ग्रीक, मिस्र और रोमन सभ्यताओं में मेथी दाना केवल मसाले के तौर पर नहीं, बल्कि औषधीय गुणों के लिए भी इस्तेमाल होता रहा है. आज भी यह एक प्राकृतिक हर्ब के रूप में कई स्वास्थ्य समस्याओं में मददगार माना जाता है. विशेषज्ञ बताते हैं कि पेट की चर्बी कम करने में भी मेथी दाना सहायक हो सकता है.
क्यों फायदेमंद है मेथी
मेथी दाना फाइबर से भरपूर होता है, जिससे पेट लंबे समय तक भरा महसूस होता है और अनावश्यक खाने की आदत कम होती है. इसमें मौजूद घुलनशील फाइबर ‘गैलेक्टोमानन’ पाचन को बेहतर बनाता है, मेटाबॉलिज़्म तेज़ करता है और ब्लड शुगर को संतुलित रखने में मदद करता है. मेटाबॉलिज़्म बढ़ने से शरीर अतिरिक्त कैलोरी और फैट को तेज़ी से जलाता है.
कैसे करें सेवन
सबसे आसान तरीका है, एक चम्मच मेथी दाना रातभर पानी में भिगो दें. सुबह खाली पेट इस पानी को छानकर पी लें और चाहें तो भीगे हुए दाने भी खा सकते हैं. दूसरा तरीका है, मेथी के दानों को हल्का भूनकर पाउडर बना लें. आधा चम्मच पाउडर गुनगुने पानी में मिलाकर सुबह खाली पेट पीने से भी फायदा मिल सकता है. इस पाउडर को आप सूप या जूस में मिलाकर भी ले सकते हैं.
सावधानी भी जरूरी
मेथी दाना एक प्राकृतिक उपाय है लेकिन किसी भी हर्बल उपाय की तरह इसे सीमित मात्रा में ही लेना चाहिए. डायबिटीज़ या अन्य क्रॉनिक बीमारी के मरीजों को इसे अपनाने से पहले डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए.
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Causes of Wrinkles: जब भी झुर्रियों की बात होती है तो अक्सर हम उम्र बढ़ने, धूप में ज्यादा समय बिताने या स्किन के सूखने को जिम्मेदार मानते हैं लेकिन अमेरिका की बिंगहैमटन यूनिवर्सिटी की एक नई रिसर्च इस धारणा को पूरी तरह बदल सकती है. इस रिसर्च के अनुसार, झुर्रियों का मुख्य कारण स्किन की भौतिक (फिजिकल) स्थिति में आने वाला तनाव और खिंचाव है, न कि सिर्फ उम्र या सूरज की किरणें.
क्या है रिसर्च की खास बात?
रिसर्चर्स ने 16 से 91 साल के लोगों के स्किन सैंपल लेकर एक विशेष मशीन ‘टेंसोमीटर’ में उनकी टेस्टिंग की. यह मशीन बताती है कि स्किन कैसे खिंचती और सिकुड़ती है. नतीजों में सामने आया कि जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, स्किन में इलास्टिसिटी (लचीलापन) कम होती जाती है. स्किन अब पहले की तरह सीधी और बराबर नहीं सिकुड़ती, बल्कि किनारों की तरफ ज्यादा खिंचती है और जब ये खिंचाव संतुलित नहीं होता तो झुर्रियां बन जाती हैं.
वैज्ञानिकों ने इस प्रोसेस को “बकलिंग” कहा है कि एक ऐसा फिजिकल रिएक्शन जिसमें सतह (जैसे स्किन) अंदर की ओर मुड़ जाती है, ठीक वैसे ही जैसे कागज को मोड़ने पर सिलवटें पड़ती हैं.
धूप और उम्र कैसे असर डालते हैं?
हालांकि रिसर्च कहती है कि फिजिक्स मुख्य कारण है, लेकिन उम्र बढ़ने और धूप से कोलेजन और इलास्टिन फाइबर पर पड़ने वाला असर इस प्रक्रिया को और तेज कर देता है. सूरज की UV किरणें स्किन के इन संरचनात्मक प्रोटीन को नुकसान पहुंचाती हैं, जिससे स्किन कमजोर और कम लचीली हो जाती है.
झुर्रियों के इलाज के नए रास्ते
यह स्टडी अब स्किनकेयर के क्षेत्र में भी नए बदलाव ला सकती है. परंपरागत क्रीम और लोशन केवल कोलेजन बढ़ाने या स्किन को हाइड्रेटेड रखने पर ध्यान देते हैं, लेकिन इस रिसर्च के बाद वैज्ञानिक माइक्रोमेश पैच और पेप्टाइड्स पर काम कर रहे हैं.
माइक्रोमेश पैच स्किन के तनाव को बराबर करने में मदद कर सकते हैं, जबकि कुछ विशेष पेप्टाइड्स स्किन सेल्स को फिर से संगठित करते हैं ताकि इलास्टिसिटी और मजबूती लौटाई जा सके.